बिहार की राजनीति में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा नेतृत्व वाले NDA के सभी 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य है। इसके बाद बिहार में NDA के भीतर भी अलग-अलग सुर सुनाई देने लगे हैं।
जदयू ने फिलहाल UCC पर सीधा समर्थन या विरोध करने के बजाय कहा है कि पहले प्रस्तावित मसौदे को देखा जाएगा और उसके प्रावधानों का अध्ययन किया जाएगा। जदयू के नेताओं की ओर से केंद्र से बातचीत की बात भी सामने आई है। वहीं पार्टी नेता श्याम रजक ने बिहार में UCC लागू किए जाने का विरोध किया है।
यही वह राजनीतिक स्थिति है, जिसमें राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने जदयू को भाजपा का साथ छोड़कर महागठबंधन के साथ आने और सरकार बनाने का सार्वजनिक न्योता दिया है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ जदयू और राजद के साथ आने से सरकार बन जाएगी?
और दूसरा सवाल—अगर जदयू NDA से अलग होती है तो क्या भाजपा इतनी आसानी से सत्ता का समीकरण बदलने देगी?
इन सवालों को समझने के लिए पहले मौजूदा संख्या बल और फिर संभावित राजनीतिक समीकरण को समझना जरूरी है।
UCC पर BJP और JDU के बीच मतभेद क्यों महत्वपूर्ण हैं?
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवस्थाओं की जगह समान कानूनी प्रावधान लाने से जुड़ा है। हालांकि इसका वास्तविक स्वरूप संबंधित कानून और उसके प्रावधानों पर निर्भर करेगा।
अमित शाह के बयान के बाद बिहार में इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हुई है।
जदयू का वर्तमान रुख यह है कि पार्टी पहले UCC का मसौदा देखेगी और उसके बाद अपनी स्थिति तय करेगी। पार्टी की ओर से केंद्र के साथ बातचीत की बात कही गई है। दूसरी ओर, जदयू के वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने बिहार में UCC लागू नहीं होने देने की बात कही है।
यानी जदयू के भीतर से भी एक जैसा राजनीतिक संदेश नहीं आया है।
यहीं से राजद को राजनीतिक अवसर दिखाई देता है।
राजद ने जदयू को सरकार बनाने का न्योता क्यों दिया?
राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने सार्वजनिक रूप से जदयू से कहा है कि वह भाजपा के साथ गठबंधन छोड़कर महागठबंधन के साथ आए और सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़े। यह बयान UCC को लेकर NDA के भीतर पैदा हुई बहस के बीच आया है।
राजद के इस प्रस्ताव को फिलहाल एक राजनीतिक प्रस्ताव के रूप में देखना चाहिए, न कि सरकार बनने की घोषणा के रूप में।
क्योंकि जमीनी सवाल संख्या बल का है।
राजद के पास 25 विधायक हैं, जबकि जदयू के पास 85 विधायक हैं। दोनों को जोड़ने पर संख्या 110 होती है।
यानी केवल RJD और JDU के सहारे बहुमत का आंकड़ा पूरा नहीं होता।
यहीं से आगे के समीकरण शुरू होते हैं।

सीटों का गणित — क्या सच में बन सकती है नई सरकार?
बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं, बहुमत के लिए 122 चाहिए। मौजूदा एनडीए सरकार में भाजपा 89, जदयू 85, लोजपा(रामविलास) 19, हम 5 और राष्ट्रीय लोक मोर्चा की 4 सीटें हैं — कुल 202
अगर जदयू (85) और राजद (25) साथ आएं तो आंकड़ा 110 पर रुक जाता है। कांग्रेस की 6 सीटें जोड़ने पर भी 121 — बहुमत से एक कम। पूरे महागठबंधन (वाम दलों समेत) को साथ लेने पर आंकड़ा 121-126 के बीच पहुंचता है, जिसमें ओवैसी की AIMIM का समर्थन भी शामिल करना पड़ सकता है। यानी सरकार बन भी जाए तो बेहद कमजोर बहुमत वाली होगी, जो किसी भी छोटी टूट से गिर सकती है।
लेकिन यहां एक और बड़ा सवाल—नीतीश कुमार खुद मुख्यमंत्री कैसे बनेंगे?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं।
नीतीश कुमार अप्रैल 2026 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा चले गए थे और इसके बाद भाजपा के सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद संभाला।
इसलिए अगर भविष्य में जदयू NDA से अलग होकर सरकार बनाने का फैसला करती है तो सवाल सिर्फ गठबंधन बदलने का नहीं होगा।
सवाल यह भी होगा कि सरकार का नेतृत्व कौन करेगा?
नीतीश कुमार स्वयं मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं तो उन्हें संवैधानिक रूप से राज्य की विधायिका का सदस्य बनने की आवश्यकता होगी। इसलिए उनके मामले में सत्ता परिवर्तन का गणित विधानसभा संख्या के साथ-साथ नेतृत्व और संवैधानिक प्रक्रिया से भी जुड़ा होगा।
यानी “JDU के पाला बदलने” और “नीतीश कुमार के फिर मुख्यमंत्री बनने” को एक ही बात मानना सही नहीं होगा।

क्या भाजपा जदयू के अलग होने के बाद सरकार बचा सकती है?
यह सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सवालों में से एक है।
मौजूदा संख्या में NDA के पास 202 विधायक हैं।
अगर जदयू के 85 विधायक NDA से बाहर हो जाते हैं तो भाजपा, LJP(RV), HAM(S) और RLM के पास:
89 + 19 + 5 + 4 = 117 विधायक बचेंगे।
यानी 122 के बहुमत आंकड़े से 5 कम।
इस स्थिति में भाजपा के सामने भी बहुमत जुटाने की चुनौती होगी।
लेकिन यहां से राजनीति केवल सीधे गठबंधन के गणित तक सीमित नहीं रहेगी।
विपक्षी दलों के विधायकों का समर्थन, किसी विधायक का विश्वास मत में अनुपस्थित रहना, गठबंधन में टूट-फूट या नए राजनीतिक गठजोड़ जैसे कई घटनाक्रम समीकरण बदल सकते हैं।
क्या जदयू में टूट हो सकती है?
यह दावा फिलहाल राजनीतिक बयान और अटकलों के स्तर पर है।
राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने हाल में जदयू में टूट की संभावना को लेकर भी दावा किया है, लेकिन इसे तथ्य के रूप में नहीं बल्कि उनके राजनीतिक बयान के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
कानूनी रूप से भी किसी पार्टी के कुछ विधायक अलग हो जाएं तो मामला इतना आसान नहीं है।
दल-बदल कानून के तहत सामान्य रूप से पार्टी छोड़ने या पार्टी निर्देश के खिलाफ मतदान करने पर अयोग्यता का सवाल उठ सकता है। संविधान की दसवीं अनुसूची में विलय के लिए संबंधित विधानमंडलीय दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति का प्रावधान है।
इसलिए “कुछ विधायक भाजपा के साथ चले जाएंगे और सरकार बन जाएगी” कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

JDU के सामने असली चुनौती क्या है?
जदयू के सामने इस समय केवल भाजपा के साथ रहने या छोड़ने का सवाल नहीं है।
पार्टी को तीन स्तरों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
पहला—UCC पर रुख
अमित शाह के बयान के बाद जदयू ने तत्काल समर्थन नहीं किया है। पार्टी मसौदा देखने और उसके बाद निर्णय लेने की बात कर रही है।
दूसरा—नीतीश कुमार की राजनीतिक भूमिका
नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन जदयू की राजनीति में उनकी भूमिका अभी भी केंद्रीय है। पार्टी फिलहाल उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने पर जोर देती दिखाई दे रही है।
तीसरा—निशांत कुमार का भविष्य
निशांत कुमार को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज है। लेकिन यहां आपके मूल ड्राफ्ट का एक सुधार जरूरी है—उन्हें “अस्पतालों के निरीक्षण में लगे मंत्री” आदि के रूप में लिखने से पहले आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्टि जरूरी है। उपलब्ध बिहार सरकार की वेबसाइटों में निशांत को स्वास्थ्य मंत्री के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, लेकिन इससे भविष्य में उनकी राजनीतिक भूमिका या मुख्यमंत्री बनने की कोई पुष्टि नहीं होती।
18 सितंबर की JDU बैठक क्यों महत्वपूर्ण है?
जदयू ने 18 सितंबर को विधायकों और सांसदों की बैठक बुलाई है। इस बैठक को लेकर UCC और पार्टी की राजनीतिक दिशा पर चर्चा की अटकलें हैं। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन और निशांत कुमार को तत्काल राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने जैसी चर्चाओं को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है।
इसलिए इस बैठक को सीधे “पाला बदलने की बैठक” कहना अभी उचित नहीं होगा।
लेकिन इतना जरूर है कि UCC पर NDA के भीतर मतभेद और राजद के खुले राजनीतिक ऑफर के बीच इस बैठक पर राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।

राजद के लिए JDU क्यों महत्वपूर्ण है?
राजद के पास 25 विधायक हैं। कांग्रेस समेत मौजूदा महागठबंधन की कुल संख्या 35 है।
इसलिए मौजूदा विधानसभा में राजद अकेले सत्ता के करीब नहीं है।
जदयू के 85 विधायक उसके साथ आते हैं तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।
यही कारण है कि राजद की ओर से जदयू को राजनीतिक संदेश दिए जा रहे हैं।
हालांकि दूसरी तरफ तेजस्वी यादव ने जदयू के भाजपा में विलय को लेकर अलग दावा किया है। यानी राजद के भीतर से भी जदयू को लेकर राजनीतिक संदेश एक दिशा में नहीं हैं।
इससे यह भी साफ होता है कि जदयू को लेकर बिहार की राजनीति में अभी अलग-अलग संभावनाओं पर राजनीतिक दांव लगाए जा रहे हैं।
क्या UCC सिर्फ कानून का मुद्दा है या गठबंधन का भी?
बिहार की मौजूदा राजनीति में UCC अब केवल कानून और संविधान की बहस नहीं रह गया है।
यह NDA के घटक दलों के बीच राजनीतिक दूरी को मापने का एक मुद्दा भी बन गया है।
भाजपा UCC को अपने प्रमुख नीतिगत एजेंडे में रखती है। वहीं जदयू फिलहाल मसौदे और प्रावधानों को देखने की बात कर रही है। इस अंतर ने राजद को जदयू के सामने राजनीतिक विकल्प रखने का मौका दिया है।
लेकिन अभी तक उपलब्ध सार्वजनिक बयानों से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि UCC के कारण जदयू NDA छोड़ने जा रही है।
नीतीश कुमार के सामने विकल्प क्या हैं?
मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को तीन संभावित परिदृश्यों में समझा जा सकता है।
पहला: जदयू NDA में बनी रहती है और UCC पर मसौदा देखने के बाद केंद्र से बातचीत करती है।
दूसरा: जदयू NDA से अलग होती है और RJD तथा अन्य विपक्षी दलों के साथ नया गठबंधन बनाने की कोशिश करती है। ऐसी स्थिति में AIMIM समेत अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।
तीसरा: जदयू NDA से अलग होने के बजाय भाजपा के साथ मतभेदों को गठबंधन के भीतर ही सुलझाने की कोशिश करती है।
इनमें से कौन सा रास्ता आगे बढ़ेगा, यह अभी राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर है।

निशांत कुमार की भूमिका
नीतीश कुमार अब राज्यसभा सदस्य हैं और स्वास्थ्य कारणों से पहले जितने सक्रिय नहीं माने जाते। ऐसे में उनके बेटे निशांत कुमार को आगे बढ़ाया जा रहा है — वे स्वास्थ्य मंत्री बनाए गए हैं और अस्पतालों के निरीक्षण में सक्रिय दिख रहे हैं। 18 सितंबर को पटना में जदयू की एक अहम बैठक बुलाई गई है, जिसमें पार्टी को एकजुट रखने और आगे की रणनीति पर बड़े फैसले हो सकते हैं।
निष्कर्ष
असली सवाल सिर्फ “पाला बदलने” का नहीं
बिहार की मौजूदा राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जदयू के पास 85 विधायक हैं और भाजपा के पास 89।
इसलिए दोनों दलों का गठबंधन विधानसभा के मौजूदा सत्ता समीकरण का आधार है।
जदयू अगर NDA से अलग होती है तो भाजपा के नेतृत्व वाले मौजूदा गठबंधन का संख्या बल 202 से घटकर 117 रह जाएगा। दूसरी तरफ जदयू अगर RJD और मौजूदा महागठबंधन के साथ जाती है तो संख्या 120 तक पहुंचती है और AIMIM के पांच विधायकों के समर्थन से यह 125 हो सकती है।
यानी गणित के स्तर पर नई सरकार की संभावना का रास्ता मौजूद है, लेकिन वह सिर्फ JDU-RJD के रिश्ते से पूरा नहीं होता।
इसके साथ ही सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व का है, क्योंकि नीतीश कुमार फिलहाल मुख्यमंत्री नहीं बल्कि राज्यसभा में हैं और बिहार की सत्ता की कमान सम्राट चौधरी के पास है।
इसलिए आने वाले दिनों में तीन चीजें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहेंगी।
UCC पर JDU का अंतिम रुख, 18 सितंबर की पार्टी बैठक और NDA के भीतर भाजपा-जदयू संबंध।
यही तीन घटनाक्रम यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि बिहार की राजनीति में अभी चल रही चर्चा केवल राजनीतिक बयानबाजी है या वास्तव में किसी बड़े गठबंधन परिवर्तन की जमीन तैयार हो रही है।
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