पटना: बिहार में सरकारी शिक्षकों के तबादले और समायोजन को लेकर बीते कुछ महीनों में सरकार की नीति में लगातार बदलाव देखने को मिले हैं। शिक्षा विभाग ने खुद अपने ही बनाए गए कई नियमों में संशोधन किया है, जिसे लेकर अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या सरकार दबाव में यह फैसले ले रही है या यह वाकई शिक्षकों और व्यवस्था दोनों की जरूरत थी।
शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि 31 अक्टूबर 2026 तक शिक्षकों की सभी मांगों और शिकायतों का समाधान कर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाएगी, इसके बाद शिक्षकों से भी उम्मीद होगी कि वे अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाएं। लेकिन पिछले कुछ महीनों के फैसलों पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग ही दिखाई देती है। सरकार ने चार बड़े फैसलों में बदलाव किया है और अब 73,151 शिक्षकों ने ट्रांसफर के लिए आवेदन दिया है, जिसके बाद तय हुआ है कि अब बिना मर्जी किसी शिक्षक का तबादला नहीं होगा।
पहला बदलाव: शनिवार को फिर से हाफ डे, केके पाठक की व्यवस्था बदली
सरकार का पहला बड़ा फैसला सरकारी स्कूलों की समय-सारणी को लेकर आया। पूर्व मुख्य सचिव केके पाठक ने 28 नवंबर 2023 को सभी सरकारी स्कूलों में सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक शिक्षकों की उपस्थिति अनिवार्य कर दी थी। इसके साथ ही शनिवार को भी पूरे दिन स्कूल संचालित करने का आदेश दिया गया था, जिससे वर्षों से चली आ रही हाफ डे व्यवस्था समाप्त हो गई थी।
उस आदेश के तहत दोपहर बाद कमजोर छात्रों के लिए मिशन दक्ष के अंतर्गत विशेष कक्षाएं चलानी होती थीं, वहीं शाम 4:15 से 5 बजे तक शिक्षकों को कॉपी जांच, छात्र प्रगति रिपोर्ट तैयार करने और अन्य शैक्षणिक कार्य करने होते थे।
अब सम्राट सरकार ने इस व्यवस्था को बदल दिया है। मुख्यमंत्री ने शनिवार को हाफ डे करने की घोषणा की, जिसकी पुष्टि शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने की और माध्यमिक शिक्षा निदेशक सज्जन आर ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी। यह नई व्यवस्था 8 अगस्त 2026 से पूरे राज्य के सरकारी स्कूलों में लागू हो गई, इससे संबंधित आधिकारिक आदेश 6 अगस्त को जारी किया गया। करीब 243 दिन बाद सरकार ने पुरानी व्यवस्था बदलते हुए शनिवार को फिर हाफ डे लागू कर दिया है।
नई व्यवस्था के अनुसार सोमवार से शुक्रवार तक स्कूल सुबह 9:30 बजे से शाम 4 बजे तक चलेंगे, जबकि शनिवार को स्कूल हाफ डे रहेगा। प्राइमरी स्कूलों में दोपहर 12 बजे तक पढ़ाई होगी, इसके बाद मिड डे मील कराकर बच्चों की छुट्टी कर दी जाएगी। माध्यमिक और उच्च विद्यालयों में छात्रों की छुट्टी दोपहर 1 बजे होगी, जबकि शिक्षक स्कूल में रुककर अगले सप्ताह की तैयारी, कॉपी जांच, मूल्यांकन और प्रशासनिक कार्य करेंगे।
दूसरा बदलाव: सरप्लस शिक्षकों के समायोजन में सरकार की बदली रणनीति
शिक्षा विभाग सरप्लस यानी जरूरत से अधिक शिक्षकों के समायोजन में जुटा है। शुरुआती योजना यह थी कि जिन स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, वहां शिक्षकों का अनिवार्य समायोजन किया जाएगा, यानी शिक्षक चाहे या न चाहे, उन्हें वहां जाना ही होगा। इस प्रस्ताव पर शिक्षक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद सरकार ने अपना रुख बदला।
31 जुलाई 2026 को शिक्षा मंत्री ने घोषणा की, कि तबादला पूरी तरह ऐच्छिक होगा, यानी अब बिना शिक्षक की सहमति के तबादला नहीं होगा। जो शिक्षक अपना ट्रांसफर नहीं चाहते, उन्हें दूसरे स्कूल नहीं भेजा जाएगा। शिक्षक जिन स्कूलों का विकल्प देंगे, पोस्टिंग केवल उन्हीं में होगी। यदि कोई शिक्षक आवेदन नहीं करता है तो उसे वर्तमान विद्यालय में ही बने रहने दिया जाएगा।
बिहार के सरकारी स्कूलों में तय संख्या से अधिक यानी सरप्लस शिक्षकों की कुल संख्या 1,06,228 है। इसमें कक्षा 1 से 5 तक के प्राथमिक विद्यालयों में 65,413, कक्षा 6 से 8 तक के मध्य विद्यालयों में 9,471, कक्षा 9 से 10 तक के हाई स्कूलों में 17,904 और कक्षा 11-12 तक के प्लस टू विद्यालयों में 14,500 सरप्लस शिक्षक शामिल हैं। इन्हीं शिक्षकों को उन विद्यालयों में समायोजित किया जाना है जहां शिक्षकों की कमी है।
अब तक 73,151 शिक्षकों ने ऑनलाइन आवेदन किया है, जिनमें 4,259 शिक्षकों ने म्यूचुअल ट्रांसफर के लिए आवेदन दिया है, जबकि 33,137 शिक्षकों ने अब तक कोई आवेदन नहीं किया है। समायोजन के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 5 अगस्त तय की गई थी।
शिक्षकों को न्यूनतम 1 और अधिकतम 30 विद्यालयों तक विकल्प देने की सुविधा दी गई है। विभाग के अनुसार पोस्टिंग इन्हीं विकल्पों में से किसी एक स्कूल में होगी, जिससे शिक्षकों को मनपसंद क्षेत्र चुनने का अवसर मिलेगा और अनचाहे तबादले की आशंका भी कम होगी।
तीसरा बदलाव: प्रोबेशन अवधि की शर्त में दी गई ढील
स्थानांतरण नियमावली के अनुसार प्रोबेशन अवधि पूरी किए बिना किसी शिक्षक को तबादले का लाभ नहीं दिया जाता था। लेकिन इस बार सरकार ने इस शर्त में ढील दी है। हाल के महीनों में योगदान देने वाले शिक्षकों को भी आवेदन का अवसर दिया गया है, जिसका सीधा लाभ TRE-3, हेड टीचर और हेडमास्टर को मिलेगा। यही नहीं, पिछले दो साल के भीतर ट्रांसफर हो चुके शिक्षकों को भी दोबारा आवेदन की अनुमति दी गई है, जिसे नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।
चौथा बदलाव: पांच साल की अनिवार्य सेवा की शर्त हटाई गई
शिक्षक स्थानांतरण नीति में पहले यह प्रावधान था कि पांच साल की सेवा पूरी करने वाले शिक्षकों का अनिवार्य तबादला किया जाएगा। इस प्रस्ताव का भी शिक्षक संगठनों ने विरोध किया था। उनका तर्क था कि पारिवारिक परिस्थितियों, स्वास्थ्य और बच्चों की पढ़ाई जैसी समस्याओं को देखते हुए सभी शिक्षकों पर एक जैसा नियम लागू करना व्यावहारिक नहीं है। सरकार ने शिक्षकों की यह मांग सुनी और नियमावली में संशोधन कर दिया। अब पांच वर्ष पूरे होने के बाद ट्रांसफर अनिवार्य नहीं रहेगा।
आगे की समय-सीमा क्या है
शिक्षा विभाग ने समायोजन और स्थानांतरण की पूरी प्रक्रिया के लिए समय-सीमा तय कर दी है। 29 जुलाई से 5 अगस्त तक सरप्लस शिक्षकों से आवेदन लिए गए। 7 सितंबर तक रैशनलाइजेशन यानी सरप्लस शिक्षकों के समायोजन की प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। 10 से 14 सितंबर के बीच म्यूचुअल ट्रांसफर की सूची जारी की जाएगी और 17 से 23 सितंबर तक सामान्य शिक्षकों के लिए ट्रांसफर पोर्टल खोला जाएगा, जिसमें वे सरप्लस शिक्षक भी आवेदन कर सकेंगे जो पहले चरण में आवेदन नहीं कर पाए थे। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से होगी, जिसकी निगरानी जिला, प्रखंड और राज्य स्तर की समितियां करेंगी।
निष्कर्ष
बिहार शिक्षा विभाग द्वारा बीते कुछ महीनों में लिए गए इन चार बड़े फैसलों से एक बात साफ है कि विभाग अपने ही बनाए नियमों में लगातार बदलाव कर रहा है। चाहे वह शनिवार की हाफ डे व्यवस्था हो, सरप्लस शिक्षकों का अनिवार्य समायोजन हो, प्रोबेशन की शर्त हो या पांच साल की अनिवार्य सेवा की बाध्यता हो, हर मामले में सरकार ने पहले सख्त रुख अपनाया और बाद में शिक्षक संगठनों के दबाव और व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए अपना फैसला बदल दिया। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी शिक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने की बात लगातार कहते नजर आते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यही बताती है कि नीति बनाने से पहले जमीनी परिस्थितियों और शिक्षक संगठनों की राय को शामिल करने की प्रक्रिया अब भी कमजोर है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार 31 अक्टूबर 2026 तक वाकई शिक्षकों की सभी मांगों और शिकायतों का समाधान कर पाती है, या यह समय-सीमा भी आगे बढ़ती चली जाएगी।
