भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में 17 जून को हुए भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने गुरुवार शाम एक अखबार से बातचीत में इस मामले को लेकर पांच बड़े दावे किए हैं, जिनमें बैलेस्टिक रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी को लेकर गंभीर आरोप शामिल हैं। संजीव कुमार सिंह भरत तिवारी के परिवार से मिलने बिलौटी गांव पहुंचे थे और वही वकील हैं जिन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सचिवालय को ईमेल भेजकर एसडीपीओ और एसटीएफ जवानों की तुरंत गिरफ्तारी की मांग की थी। इस ईमेल याचिका पर राष्ट्रपति सचिवालय ने संज्ञान लेते हुए बिहार के मुख्य सचिव को जरूरी कार्रवाई के निर्देश भी दिए थे।
घटना से पहले क्या हुआ था
वकील के दावे के अनुसार, 16 जून को शाहपुर के D.S.P राजेश कुमार शर्मा की ओर से भरत तिवारी के बारे में एक रिपोर्ट पुलिस हेडक्वार्टर भेजी गई, जिसमें कहा गया कि यहां बड़ी घटना, फसाद या झगड़ा हो सकता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर एनकाउंटर के लिए एसटीएफ की टीम को बुलाया गया, जबकि वकील का दावा है कि मौके पर ऐसी कोई घटना होने वाली नहीं थी।
वकील संजीव कुमार सिंह के पांच दावे
पहला दावा : STF पहले से मौके पर मौजूद थी। संजीव कुमार सिंह के अनुसार STF की टीम 16 जून को ही बिलौटी गांव पहुंच गई थी। एक दिन बाद, 17 जून को भरत तिवारी ने फेसबुक पर लाइव आकर सरेंडर किया, लेकिन उसे घेरकर पहले तीन गोली मारी गई। तीन गोली लगने के बाद भी उसकी मौत नहीं हुई तो उसे गाड़ी में बैठाया गया और फिर दो गोली और मारी गईं। वकील का दावा है कि पहली तीन गोली और बाद की दो गोली के बीच पंद्रह मिनट का अंतर था।
दूसरा दावा : सबूत मिटाने के लिए बाद की दो गोली। वकील का कहना है कि गाड़ी में मारी गई दो गोली हत्या की नीयत से चलाई गईं, ताकि भरत तिवारी जिंदा बचकर घटना की सच्चाई सामने न ला सके।
तीसरा दावा : पांच अलग-अलग पिस्टल से गोली। वकील के अनुसार बैलेस्टिक टेस्ट में सामने आया है कि भरत तिवारी को पांच अलग-अलग पिस्टल से गोली मारी गई, यानी संभव है कि पांचों गोली अलग-अलग पुलिसकर्मियों ने चलाई हों। उनका यह भी दावा है कि शुरुआती तीन गोली थोड़ी दूरी से और बाद की दो गोली बिल्कुल करीब से, गाड़ी के भीतर मारी गईं, जिनमें से एक गोली से आंतरिक हिस्से की नस फटने से मौत हुई।
चौथा दावा : 1,400 करोड़ रुपये के घोटाले को दबाने के लिए हत्या। वकील का कहना है कि हत्या का एक बड़ा मकसद जवइनिया गांव के विस्थापितों के पुनर्वास के लिए स्वीकृत 1,400 करोड़ रुपये के फंड में हुआ घोटाला भी था। यह दावा नया नहीं है। भरत तिवारी की मां आशा देवी पहले भी सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगा चुकी हैं कि उनके बेटे की हत्या इसी घोटाले को उजागर होने से रोकने के लिए कराई गई। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि अभी तक सामने नहीं आई है।
वकील ने यह भी कहा कि लाइव वीडियो, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और एनकाउंटर से पहले-बाद पुलिसकर्मियों की मोबाइल पर हुई बातचीत की डीआर रिपोर्ट अहम सबूत हैं, और गिरफ्तारी के बाद वे अदालत में हत्या और पुलिसकर्मियों की मिलीभगत साबित करने का दावा कर रहे हैं।
पांचवां दावा : एक हफ्ते में गिरफ्तारी। वकील के मुताबिक डीआईजी की रिपोर्ट में जगदीशपुर डीएसपी, शाहपुर थाने के एसएचओ और एसटीएफ जवानों की मिलीभगत का जिक्र है, और मुख्य साजिशकर्ता जगदीशपुर के एसडीएम हैं। उन्होंने बताया कि आरोपी पुलिसकर्मियों के गैर-जमानती वारंट के लिए आरा कोर्ट में याचिका दायर की गई है और एक सप्ताह के भीतर वारंट जारी होने का दावा किया।
प्रशांत किशोर बनाम मनोज तिवारी — नया विवाद
इसी बीच मामले ने एक राजनीतिक मोड़ भी ले लिया है। पटना हाईकोर्ट की वकील वर्षा सिंह ने दावा किया कि जन सुराज प्रमुख प्रशांत किशोर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भरत तिवारी की मां को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ओर से सरकारी फंड से 50 लाख रुपये दिए गए हैं। वर्षा सिंह ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि परिवार को कोई अनुदान राशि नहीं मिली है, और भरत तिवारी की मां आशा देवी इस बयान के बाद परेशान और अस्वस्थ हो गई हैं।
बांकीपुर उपचुनाव में जीत के बाद प्रशांत किशोर ने सांसद मनोज तिवारी पर निशाना साधते हुए कहा था कि चुनाव के समय मनोज तिवारी ने ही भरत तिवारी के परिवार को न्याय दिलाने का भरोसा देकर पटना बुलाया था और सम्राट चौधरी से मुलाकात कराई थी, इसलिए अब न्याय दिलाने की जिम्मेदारी भी मनोज तिवारी की है। प्रशांत किशोर ने मनोज तिवारी को चुनौती दी कि अगर वे परिवार को न्याय नहीं दिला सके तो भविष्य में बिहार आने पर उन्हें माफी नहीं मिलेगी।
हालांकि भरत तिवारी की मां आशा देवी और भाई चंदन तिवारी ने प्रशांत किशोर के 50 लाख रुपये वाले दावे को पूरी तरह झूठा और निराधार बताते हुए खारिज किया है। परिवार ने चेतावनी दी है कि अगर पंद्रह दिनों के भीतर इस आरोप का कोई प्रमाण पेश नहीं किया गया तो वे प्रशांत किशोर के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे। प्रशांत किशोर की ओर से अभी तक इस पर सीधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अब तक क्या पुष्टि हुई है
- भरत तिवारी की मौत 17 जून को भोजपुर के बिलौटी गांव में पुलिस मुठभेड़ में हुई थी, यह तथ्य विवाद से परे है।
- सार्वजनिक हुई पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उन्हें पांच गोली लगी थीं, सभी शरीर के निचले हिस्से में।
- सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह की ईमेल याचिका पर राष्ट्रपति सचिवालय ने संज्ञान लिया और बिहार के मुख्य सचिव को कार्रवाई के निर्देश दिए, यह तथ्य पुष्टि हो चुका है।
- मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के निर्देश पर रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में एक न्यायिक जांच आयोग बनाया गया है और इस मामले में एक STF जवान की गिरफ्तारी भी हो चुकी है।
- सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच की मांग वाली एक अलग याचिका को खारिज करते हुए संबंधित हाईकोर्ट जाने को कहा था।
- 1,400 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप परिवार और वकील दोनों की ओर से बार-बार दोहराया गया है, लेकिन इसकी स्वतंत्र या आधिकारिक जांच रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।
- पांच अलग-अलग पिस्टल से गोली चलाए जाने और गाड़ी के भीतर मारी गई गोली से आंतरिक नस फटने के दावे की पुष्टि उपलब्ध पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्वतंत्र रूप से नहीं होती, क्योंकि उसमें सभी घाव जांघों और पैर में दर्ज हैं।
निष्कर्ष
भरत तिवारी एनकाउंटर मामला अब सिर्फ एक पुलिस मुठभेड़ की जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें हत्या की साजिश, प्रशासनिक घोटाला और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तीनों धागे आपस में उलझ गए हैं। वकील संजीव कुमार सिंह के दावे गंभीर हैं और मामले को नया आयाम देते हैं, लेकिन इनमें से कई बातें — जैसे पांच अलग-अलग पिस्टल का इस्तेमाल, गोलियों के बीच पंद्रह मिनट का अंतर और आंतरिक नस फटने से मौत — अभी तक स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुई हैं और अदालत में साबित होना बाकी है। वहीं प्रशांत किशोर और मनोज तिवारी के बीच शुरू हुआ नया विवाद परिवार के दर्द को राजनीतिक मुद्दा बनाने की दिशा में जाता दिख रहा है, जिसे परिवार ने खुद खारिज किया है। कुल मिलाकर, अंतिम सच्चाई न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट, बैलेस्टिक रिपोर्ट और अदालत की सुनवाई से ही सामने आएगी। तब तक इन दावों को पुष्ट तथ्य के बजाय एक पक्ष के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
