बिहार में पंचायत परिसीमन शुरू: 8,053 पंचायतों की तस्वीर बदलेगी, जानें आपके गांव-वार्ड का क्या होगा

बिहार में पंचायती राज व्यवस्था को लेकर बड़ा बदलाव शुरू हो चुका है। राज्य की सभी 8,053 पंचायतों का परिसीमन प्रक्रिया में है और इसके जुलाई 2027 तक पूरा होने का अनुमान जताया जा रहा है। परिसीमन पूरा होने के बाद ही पंचायत चुनाव की अगली प्रक्रिया शुरू होगी। पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मुताबिक, तकनीकी प्रक्रियाओं के चलते अब यह चुनाव 2026 के बजाय 2027 के जुलाई-अगस्त में होने की संभावना है। ऐसे में हर ग्रामीण मतदाता के मन में सवाल है—मेरी पंचायत का क्या होगा, कौन सी सीट रिजर्व होगी और मेरा गांव किस पंचायत में जाएगा।

परिसीमन क्यों जरूरी हुआ और यह होगा कैसे

बिहार में पंचायतों का आखिरी परिसीमन 1991 की जनगणना के आधार पर 1993-94 में हुआ था, जब राज्य की आबादी 8.63 करोड़ थी और झारखंड भी बिहार का हिस्सा था। साल 2000 में झारखंड अलग होने के बाद बिहार की आबादी घटकर 6.45 करोड़ रह गई थी, जबकि बिहार जातीय गणना-2023 के मुताबिक अब यह आंकड़ा 13.2 करोड़ तक पहुंच चुका है। इसमें करीब 89% आबादी गांवों में रहती है। यानी करीब 35 साल से पंचायतों की सीमाएं वही पुरानी हैं, जबकि आबादी लगभग दोगुनी हो चुकी है। फिलहाल औसतन 20 हजार की आबादी पर एक मुखिया है, जिसे संतुलित करना परिसीमन का मुख्य मकसद बताया जा रहा है।
15 जुलाई को सम्राट कैबिनेट ने पंचायतों के परिसीमन को मंजूरी दी और 20 जुलाई 2026 को पंचायती राज विभाग ने औपचारिक आदेश जारी कर दिया। यह परिसीमन 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होगा और इसे राज्य निर्वाचन आयोग की देखरेख में पूरा किया जा रहा है। इस काम के लिए सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 में करीब 3 करोड़ रुपये भी जारी किए हैं, जिनका इस्तेमाल CEB लेआउट मैप, EB मैपिंग और ब्लॉकवार गणना जैसे तकनीकी कार्यों में होगा।
परिसीमन के लिए प्रखंड को प्रशासनिक इकाई माना गया है, जबकि जिला परिषद क्षेत्र के लिए पूरा जिला इकाई होगा। वार्ड सदस्य और पंच के लिए पंचायत को इकाई माना जाएगा। सबसे अहम बात यह है कि किसी भी राजस्व गांव का बंटवारा नहीं किया जाएगा—पूरा गांव हमेशा एक ही पंचायत में रहेगा, हालांकि गांव को एक पंचायत से हटाकर दूसरी पंचायत में जरूर जोड़ा जा सकता है।

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पंचायतों की संख्या, सीटों में बदलाव और आरक्षण रोस्टर

पंचायती राज विभाग के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, परिसीमन के बाद पंचायतों और जनप्रतिनिधियों की संख्या में करीब 60% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। मुखिया और सरपंच के पद मौजूदा 8,053 से बढ़कर करीब 13,000 तक पहुंच सकते हैं, जबकि वार्ड सदस्य और पंच के पद 1,15,000 से बढ़कर करीब 1,80,000 तक हो सकते हैं। जिला परिषद सदस्यों की संख्या भी 1,160 से बढ़कर लगभग 1,800 तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि विभाग ने साफ किया है कि ये आंकड़े संभावित हैं और अंतिम आंकड़े परिसीमन पूरा होने के बाद ही तय होंगे।
नई पंचायत बनाने का आधार आबादी और भौगोलिक स्थिति दोनों होंगे—मोटे तौर पर करीब 7,000 की आबादी पर एक ग्राम पंचायत, 500 पर एक वार्ड, 5,000 पर पंचायत समिति क्षेत्र और 50,000 पर जिला परिषद क्षेत्र बनाने का फॉर्मूला अपनाया जाएगा। लेकिन यह कोई सख्त नियम नहीं है; भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर किसी पंचायत की वास्तविक आबादी इस दायरे से ऊपर-नीचे भी हो सकती है।
आरक्षण को लेकर बिहार पंचायती राज अधिनियम-2006 के तहत हर दो चुनावों के बाद रोस्टर बदलना अनिवार्य है। आखिरी बार यह रोस्टर 2016 में बदला था, इसलिए 2016 और 2021 में एक जैसा रोस्टर रहने के बाद अगले चुनाव में यह अपने-आप बदल जाएगा। इसका सीधा असर OBC, EBC, SC-ST और महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर पड़ेगा। संविधान के अनुच्छेद-243D के तहत SC-ST को आबादी के अनुपात में और राज्य कानून के तहत EBC-OBC को अलग से 20% आरक्षण मिलता है, जबकि महिलाओं के लिए 50% सीटें आरक्षित रहेंगी—हालांकि सभी वर्गों को मिलाकर आरक्षण 50% की सीमा से ज्यादा नहीं हो सकता।

मेरी पंचायत, वोटर कार्ड और शिकायत का रास्ता

सबसे बड़ी आशंका यही है कि क्या मौजूदा पंचायत टूट सकती है। जवाब है—हां, ऐसा संभव है। किसी पंचायत की सीमा बदली जा सकती है, कोई गांव एक पंचायत से निकालकर पड़ोसी पंचायत में जोड़ा जा सकता है, या नई पंचायत भी बनाई जा सकती है। लेकिन यह फैसला मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि तय प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत ही होगा। राहत की बात यह है कि सिर्फ पंचायत की सीमा बदलने से आपका प्रखंड, विधानसभा क्षेत्र या वोटर कार्ड अपने-आप नहीं बदलेगा—इनकी अलग-अलग प्रशासनिक और निर्वाचन सीमाएं हैं। हां, मतदाता सूची में वार्ड नंबर या मतदान केंद्र का विवरण जरूर अपडेट हो सकता है।
अपने गांव की नई पंचायत की सही जानकारी के लिए पंचायत सचिव, राजस्व कर्मी और अंचल अमीन से संपर्क किया जा सकता है, जो निचले स्तर पर परिसीमन का प्रस्ताव तैयार करते हैं। इसके अलावा बिहार पंचायती राज विभाग की वेबसाइट, जिला प्रशासन की वेबसाइट, संबंधित प्रखंड-अंचल कार्यालय और बिहार राज्य निर्वाचन आयोग की वेबसाइट से भी अद्यतन जानकारी ली जा सकती है।
अगर किसी को लगता है कि उसका गांव गलत पंचायत में डाल दिया गया है, तो शुरुआती ढांचा प्रपत्र-3 (Form-3) के रूप में पंचायत और प्रखंड कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर चिपकाया जाएगा। इसके प्रकाशन के 15 दिनों के भीतर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है, जिस पर जिलाधिकारी विचार करेंगे। सभी आपत्तियों के निपटारे के बाद अंतिम पंचायत क्षेत्र प्रपत्र-4 (Form-4) के जरिए घोषित होंगे और जिला गजट में प्रकाशित किए जाएंगे।

निष्कर्ष

बिहार में 35 साल बाद हो रहा यह पंचायत परिसीमन सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि करीब 13.2 करोड़ की आबादी को नए सिरे से प्रतिनिधित्व देने की कोशिश है। इससे न सिर्फ पंचायतों और जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि आरक्षण रोस्टर में भी बड़ा फेरबदल तय है। आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बात यह समझना है कि पंचायत बदलने से वोटर कार्ड, प्रखंड या विधानसभा क्षेत्र अपने-आप नहीं बदलते, और अगर सीमा तय करने में कोई गड़बड़ी दिखे तो 15 दिनों की तय समयसीमा में आपत्ति दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। फिलहाल जुलाई 2027 तक परिसीमन पूरा होने और उसके बाद जुलाई-अगस्त 2027 में पंचायत चुनाव होने की संभावना जताई जा रही है, हालांकि सरकार ने अभी तक कोई अंतिम तारीख तय नहीं की है। ऐसे में हर ग्रामीण मतदाता को अपनी पंचायत, वार्ड और आरक्षण से जुड़ी अधिसूचनाओं पर लगातार नजर रखनी होगी।

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