बिहार में शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश: NCAER की रिपोर्ट में बड़ा दावा, जानें क्या कहते हैं आंकड़े और राजनीतिक दल

बिहार में एक दशक से लागू शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) ने अपनी एक रिसर्च रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि राज्य की तेज आर्थिक तरक्की के लिए शराबबंदी को खत्म करना जरूरी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह कानून अपने मूल मकसद में पूरी तरह फेल रहा है।

NCAER की रिपोर्ट में क्या कहा गया

मशहूर टेक्नोक्रेट नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता वाली संस्था NCAER ने 6 से 8 अगस्त तक आयोजित इंडिया पॉलिसी फोरम-2026 में यह रिसर्च पेपर पेश किया। इसमें बताया गया कि बिहार देश की आबादी का 9% से ज्यादा हिस्सा है और 2026 में इसकी जनसंख्या 13.2 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार तीन स्रोतों से पैसा जुटाती है — वस्तु एवं सेवा कर, कर-पंजीकरण शुल्क और भू-राजस्व। इनमें से कर-पंजीकरण शुल्क और भू-राजस्व से आगे कमाई बढ़ाने की गुंजाइश बेहद सीमित है, क्योंकि 99% परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है।
रिपोर्ट का सबसे बड़ा दावा यह है कि राज्य की आय बढ़ाने का सबसे कारगर जरिया वस्तु एवं सेवा कर ही हो सकता है, लेकिन इसके लिए शराबबंदी हटाकर शराब पर एक्साइज ड्यूटी दोबारा लागू करनी होगी।

शराबबंदी अपने मकसद में नाकाम, दावा

अप्रैल 2016 में शराबबंदी इस सोच के साथ लागू की गई थी कि इससे घरेलू हिंसा में कमी आएगी। लेकिन NCAER की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में कोई कमी नहीं आई, बल्कि इनमें बढ़ोतरी ही देखी गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बंदी से पहले के तीन वर्षों में एक्साइज ड्यूटी राज्य की कुल कमाई का करीब 14% हिस्सा थी, जो शराबबंदी के बाद पूरी तरह खत्म हो गई। इसके साथ ही तस्करी रोकने और निगरानी पर होने वाला सरकारी खर्च भी लगातार बढ़ता गया।

NCRB 2012-24 रिपोर्ट, महिलाओं के खिलाफ अपराध

BAI ने भी लिखा था CM को पत्र

NCAER की रिपोर्ट से पहले जुलाई में ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने भी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर शराबबंदी की समीक्षा की मांग की थी। संस्था के महानिदेशक विनोद गिरी ने दावा किया था कि 10 साल के अनुभव से साफ है कि बिहार में शराब गायब नहीं हुई, बल्कि सरकार के नियंत्रण से बाहर चली गई है। BAI के अनुमान के मुताबिक, बीते 10 साल में राज्य सरकार को करीब 60,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, जबकि होटल, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और परिवहन जैसे सहायक उद्योगों को भी भारी क्षति पहुंची।

अर्थशास्त्रियों की राय बंटी हुई

पटना यूनिवर्सिटी के शिक्षक अविरल पांडेय का कहना है कि शराबबंदी को केवल राजस्व के नजरिए से देखना ठीक नहीं है। उनके मुताबिक, NFHS सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि शराब पीने वाले पुरुषों की संख्या में लगातार गिरावट आई है, जिसका सीधा असर महिलाओं की सुरक्षा पर पड़ा है। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि अवैध शराब और तस्करी की समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी होना और जहरीली शराब से मौतें, गंभीर चिंता का विषय हैं।
वहीं पटना यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शांतनु का तर्क है कि बिहार के सामाजिक ढांचे को देखते हुए अभी शराबबंदी हटाना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और स्वास्थ्य से जुड़े कई आंकड़ों में बिहार पड़ोसी राज्यों यूपी और बंगाल से बेहतर स्थिति में है।

क्या सम्राट सरकार सिफारिश मानेगी

फिलहाल इसकी संभावना बेहद कम नजर आती है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कई मौकों पर साफ कह चुके हैं कि नीतीश कुमार के इस ऐतिहासिक फैसले को बदला नहीं जाएगा। 10 अगस्त को मंत्री सुनील कुमार ने भी दोहराया कि राज्य में शराबबंदी कानून पूरी तरह लागू है और सरकार अपने रुख पर कायम है।
दरअसल यह मुद्दा सीधे वोट बैंक से जुड़ा है। 2025 विधानसभा चुनाव में 243 में से 130 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोट डाले, और इनमें से 88% सीटें नीतीश-नेतृत्व वाले NDA ने जीतीं। यही वजह है कि प्रशांत किशोर ने भी बांकीपुर उपचुनाव में शराबबंदी पर एक शब्द नहीं बोला, जबकि 2025 के पूरे चुनावी कैंपेन में शराबबंदी खत्म करने का वादा करने के बावजूद जनसुराज को महज 3.3% वोट मिले थे।

राजनीतिक दलों का रुख

JDU को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख दलों के नेता समय-समय पर शराबबंदी हटाने की मांग उठाते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी लगातार गुजरात मॉडल लागू करने की वकालत कर रहे हैं, तो RJD नेता तेजस्वी यादव इसे 40,000 करोड़ रुपए के अवैध समानांतर कारोबार का जरिया बता चुके हैं। वहीं JDU नेता और मंत्री अशोक चौधरी ने भी संकेत दिया था कि नीतीश कुमार के बाद इस कानून का भविष्य अनिश्चित हो सकता है। दूसरी ओर, सरकार की तरफ से लगातार यह दोहराया जा रहा है कि फिलहाल कानून की समीक्षा का कोई प्रस्ताव नहीं है।

निष्कर्ष:

शराबबंदी को लेकर NCAER की सिफारिश ने बहस को नया मोड़ दे दिया है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह मामला सिर्फ आंकड़ों का नहीं, राजनीति का भी है। एक तरफ आर्थिक नुकसान और अवैध शराब कारोबार के मजबूत तर्क हैं, तो दूसरी तरफ महिला सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से जुड़ी चिंताएं। शराबबंदी सीधे महिला वोट बैंक से जुड़ा मुद्दा बन चुका है — 2025 चुनाव में जिन 130 सीटों पर महिलाओं ने ज्यादा वोट डाले, उनमें से 88% NDA ने जीतीं। यही वजह है कि प्रशांत किशोर जैसे नेता भी अब इस मुद्दे से दूरी बना चुके हैं, जबकि पहले इसे हटाने का वादा करके हार का सामना कर चुके हैं।
सम्राट सरकार का रुख फिलहाल बिल्कुल साफ है — नीतीश कुमार के फैसले में कोई बदलाव नहीं होगा। ऐसे में NCAER की रिपोर्ट भले ही आर्थिक नजरिए से मजबूत दिखे, लेकिन बिहार की मौजूदा राजनीति में इसे लागू करना निकट भविष्य में मुश्किल ही नजर आता है। असल सवाल यह नहीं कि शराबबंदी सही है या गलत, बल्कि यह है कि क्या कोई भी सरकार महिला वोटरों को नाराज करने का जोखिम उठाने को तैयार होगी।

(यह रिपोर्ट NCAER की रिसर्च और सार्वजनिक बयानों पर आधारित है)

Leave a Comment