बिहार विधान परिषद की 8 सीटों के लिए चुनाव की तैयारी शुरू होते ही सबसे बड़ा सियासी भूचाल खुद सत्तारूढ़ जदयू के भीतर से आया है। मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने खुलकर ऐलान कर दिया है कि वे पटना स्नातक क्षेत्र से मौजूदा एमएलसी नीरज कुमार का साथ नहीं देंगे। इसके बजाय उन्होंने डाॅ. अनुज सिंह को अपना पूरा समर्थन देने की घोषणा की है।
अनंत सिंह ने अपने चिरपरिचित अंदाज में यह भी कहा कि जो उनका साथ नहीं देगा, वे भी उसका साथ क्यों देंगे। इस बयान को सीधे तौर पर नीरज कुमार के खिलाफ एक सुनियोजित घेराबंदी के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि नीरज कुमार खुद जदयू के वरिष्ठ नेता और पार्टी प्रवक्ता हैं। यानी बाहर विपक्ष से मुकाबला शुरू होने से पहले ही पार्टी के भीतर संघर्ष सतह पर आ चुका है।
अनंत सिंह ने बड़ा दावा भी किया है- उनका कहना है कि पटना स्नातक क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी 26 विधानसभा क्षेत्रों में उनके समर्थक और कार्यकर्ता अनुज सिंह के पक्ष में खड़े होंगे। हालांकि स्नातक मतदाता ही वोट डालते हैं। इसलिए विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक प्रभाव और स्नातक मतदाताओं के बीच वास्तविक समर्थन, दोनों एक बात नहीं हैं। अनंत सिंह का प्रभाव तभी निर्णायक साबित होगा जब वे इन मतदाताओं को वाकई अपने पाले में ला पाएं।
नीरज कुमार के लिए यह चुनाव राजनीतिक रूप से बेहद अहम है। उनके पास लंबा चुनावी अनुभव और मजबूत नेटवर्क हैं, लेकिन इस बार चुनौती तीन तरफा हो गई है- एक तरफ पार्टी संगठन, दूसरी तरफ अनंत सिंह के समर्थन वाले अनुज सिंह, और तीसरी तरफ अगर जन सुराज ने मजबूत उम्मीदवार उतारा तो मुकाबला और पेचीदा हो जाएगा।
शिक्षक सीटों पर सवाल: क्या MLC शिक्षकों की आवाज बन पाए?
इस बार विधान परिषद की 8 सीटों में से 4 सीटें शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की हैं, और यही सीटें सबसे दिलचस्प सवाल खड़े कर रही हैं। सवाल सीधा है — जो लोग पिछली बार शिक्षक कोटे से एमएलसी बने थे, क्या उन्होंने शिक्षकों की समस्याओं को सदन तक पहुंचाने का काम ईमानदारी से किया? बिहार में 2026 की शिक्षक स्थानांतरण प्रक्रिया को लेकर शिक्षकों के बीच लंबे समय से नाराजगी रही है, और सरप्लस शिक्षकों के तबादले का मामला अदालत तक भी पहुंचा।
अब चुनाव नजदीक आते ही शिक्षक खुद कई सवाल पूछते नजर आ रहे हैं — मेरा ट्रांसफर कहां हुआ, किसका ट्रांसफर रुका, किसे घर के पास पोस्टिंग मिली, और कौन अब भी दूर के स्कूल में तैनात है। विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की खासियत यही है कि यहां शिक्षक सिर्फ मुद्दा नहीं, बल्कि खुद वोटर भी होते हैं। इसलिए ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर बनी नाराजगी सीधे चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है।
तिरहुत स्नातक सीट पर मौजूदा एमएलसी वंशीधर ब्रजवासी की पहचान शिक्षकों के मुद्दों पर मुखर नेता की रही है, और शिक्षक ट्रांसफर उनके लिए दोधारी तलवार साबित हो सकता है। अगर शिक्षक समुदाय मानता है कि उनकी आवाज ने वाकई असर डाला, तो फायदा होगा। लेकिन अगर शिक्षकों को लगता है कि सिर्फ बोलने से समस्या हल नहीं हुई, तो विरोधी उम्मीदवार इसी नाराजगी को हथियार बना सकते हैं।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इस बार दावेदारी किसकी होगी, बल्कि यह भी है कि क्या जनता का भरोसा दोबारा जीता जा सकेगा — या फिर शिक्षक इस बार बदलाव के मूड में हैं।

जन सुराज की एंट्री और मुकाबले का बदलता समीकरण
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी इस चुनाव को हल्के में लेने के मूड में नहीं दिख रही। पार्टी ने सभी 8 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर ली है। सारण और तिरहुत सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम लगभग तय बताए जा रहे हैं, जबकि पटना, कोसी और दरभंगा सीटों पर प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया अभी जारी है।
बांकीपुर सीट जीतकर विधायक बन चुके प्रशांत किशोर के लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी टीम स्नातक मतदाताओं और शिक्षक संगठनों के बीच अपनी पकड़ बना पाती है। अगर जन सुराज किसी एक-दो सीट पर मजबूत प्रदर्शन करता है, तो इसे पार्टी के संगठनात्मक विस्तार का बड़ा संकेत माना जाएगा। पटना स्नातक सीट पर अगर जन सुराज का उम्मीदवार मजबूत होकर उभरा, तो अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच के सीधे मुकाबले को तीसरा कोण मिल जाएगा — जिससे वोटों का बिखराव तय है।
निष्कर्ष
बिहार विधान परिषद की ये 8 सीटें संख्या में भले छोटी हों, लेकिन इनका राजनीतिक संकेत बड़ा है। एक तरफ सत्तारूढ़ जदयू के भीतर ही अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच खुली जंग छिड़ चुकी है, जो पार्टी संगठन के लिए असहज स्थिति है। दूसरी तरफ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में शिक्षक अब सिर्फ मूकदर्शक नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले वोटर बन चुके हैं — और मौजूदा MLC की कार्यशैली पर सीधा फैसला उन्हीं के हाथ में है। जन सुराज की एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। कुल मिलाकर 16 नवंबर 2026 को मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने से पहले यह तय होना बाकी है कि जनता पुराने चेहरों पर भरोसा जताएगी या बदलाव को तरजीह देगी।
