बिहार में आरक्षण को लेकर एक बार फिर सियासत गरम है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में आरक्षित सीटों से चुनाव जीतने वाले शीर्ष दलित नेताओं की संपत्ति में औसतन सैकड़ों प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि जमीनी स्तर पर आम SC परिवार आज भी फूस और टीन के घरों में गुजर-बसर करने को मजबूर हैं।
आरक्षण पर सियासत फिर तेज़, लेकिन जमीनी हकीकत क्या है?
बिहार में आरक्षण एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। NDA गठबंधन के भीतर ही दलित नेताओं के सुर अलग-अलग सुनाई दे रहे हैं — केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी जहां आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग उठा रहे हैं, वहीं लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान इसके पूरी तरह खिलाफ नजर आ रहे हैं। इसी बहस के बीच बिहार के अनुसूचित जाति (SC) समुदाय की असल आर्थिक-सामाजिक स्थिति और उनकी नुमाइंदगी करने वाले नेताओं की माली हालत के बीच का फासला एक बार फिर चर्चा में है।
पूर्णिया, हाजीपुर, बोधगया, दरभंगा और भोजपुर जैसे जिलों में रहने वाले SC परिवारों की कहानियां बताती हैं कि आजादी के दशकों बाद भी बड़ी संख्या में लोग मजदूरी, कच्चे मकान और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। तीन-तीन पीढ़ियां मजदूरी करते हुए गुजर गईं, लेकिन आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।

जातीय गणना के आंकड़े: गरीबी की तस्वीर
बिहार जातीय गणना के आंकड़े इस असमानता को साफ तौर पर उजागर करते हैं। राज्य में लगभग 43.93% SC परिवारों की मासिक आमदनी ₹6,000 से भी कम है। करीब 63% दलित आबादी या तो बेरोजगार है या उसके पास कोई नियमित रोजगार नहीं है।
आवास की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। 22.67% SC परिवार आज भी कच्चे मकानों में रहते हैं, जबकि 26% टीन-शेड और 15% झोपड़ियों में गुजर-बसर करते हैं। शिक्षा के मोर्चे पर भी 14% लोग केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई कर पाए हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि दशकों की आरक्षण नीति के बावजूद समुदाय के एक बड़े हिस्से तक इसका लाभ पूरी तरह नहीं पहुंच पाया।
दस साल में नेताओं की संपत्ति में कितना उछाल?
दूसरी तरफ, चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामों की पड़ताल से पता चलता है कि आरक्षित सीटों से प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष दलित नेताओं की माली हालत में बीते एक दशक में भारी उछाल आया है। बिहार के आठ प्रमुख दलित नेताओं की संपत्ति में औसतन करीब 400% की वृद्धि दर्ज की गई है।
आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी के वरिष्ठ नेता शिवेश राम की संपत्ति में 2010 से 2025 के बीच सबसे तेज बढ़ोतरी हुई — करीब 1545% की वृद्धि के साथ यह 56.40 लाख रुपए से बढ़कर 9.28 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। जदयू नेता अशोक चौधरी की संपत्ति 2009 से 2026 के बीच 526% बढ़कर 7.70 करोड़ रुपए हो गई। इसी तरह जदयू के महेश्वर हजारी की संपत्ति 11 वर्षों में 404% से अधिक बढ़कर 10.85 करोड़ रुपए तक पहुंच गई।
लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान की संपत्ति 2014 में 1.4 करोड़ रुपए थी, जो 2024 तक बढ़कर 2.68 करोड़ रुपए हो गई। हालांकि सबसे कम बढ़ोतरी केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की संपत्ति में दर्ज हुई, जो 2014 के 23.60 लाख रुपए से 2024 में मामूली इजाफे के साथ 30.20 लाख रुपए तक ही पहुंच सकी।

आम आदमी और नेता की जिंदगी में कितना फासला?
इन आंकड़ों की तुलना जमीनी हकीकत से करें तो फासला और साफ हो जाता है। जहां एक तरफ पूर्णिया के मजदूर परिवार बरसात की रातें जागकर गुजारने और सरकारी दफ्तरों में काम के लिए घूस देने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी तरफ शीर्ष दलित नेता करोड़ों की संपत्ति, लग्जरी गाड़ियों और Z+ सुरक्षा कवर के साथ जीवन बिता रहे हैं। हाजीपुर, बोधगया और दरभंगा के परिवारों की कहानियां बताती हैं कि शिक्षा और मजदूरी के सहारे आर्थिक स्थिति में मामूली सुधार तो हुआ है, लेकिन सरकारी नौकरी और स्थायी आर्थिक सुरक्षा आज भी दूर की कौड़ी बनी हुई है।
बिहार में दलित उपजातियों में सबसे बड़ी आबादी दुसाध/धारी/धरही (5.31%) और चमार/रविदास/मोची (5.26%) समुदाय की है, इसके बाद मुसहर समुदाय (3.09%) का स्थान आता है। यही समुदाय आज भी सबसे ज्यादा आर्थिक पिछड़ेपन से जूझ रहे हैं, भले ही उनकी नुमाइंदगी करने वाले नेता सत्ता के गलियारों में मजबूती से खड़े हों।
निष्कर्ष
बिहार में आरक्षण को लेकर छिड़ी मौजूदा बहस के बीच जातीय गणना और चुनावी हलफनामों के आंकड़े एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं — क्या आरक्षण नीति का लाभ वास्तव में जरूरतमंद तबके तक पहुंच रहा है, या यह मुख्य रूप से राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने वाले चुनिंदा परिवारों तक ही सिमट कर रह गया है? आंकड़े बताते हैं कि जहां नेताओं की संपत्ति में सैकड़ों प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है, वहीं आम SC परिवारों की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं, पक्के मकान और रोजगार के लिए संघर्ष कर रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार की राजनीति में और गरमाने के आसार हैं।
