जस्टिस यशवंत वर्मा कैश केस: संसदीय समिति ने तीनों आरोप सही पाए

जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड में संसद की जांच समिति ने बड़ा फैसला सुनाया है। समिति ने जस्टिस वर्मा पर लगे तीनों आरोपों को सही पाया है। यह पूरा मामला वर्ष 2025 में उनके सरकारी आवास के स्टोररूम से भारी मात्रा में नकदी मिलने से जुड़ा है। पैनल की रिपोर्ट बुधवार, 12 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वर्मा के स्टोररूम में ₹500 के नोटों की बड़ी मात्रा मिली थी, लेकिन वे नकदी के स्रोत, मालिकाना हक या वहां उसकी मौजूदगी की कोई संतोषजनक वजह नहीं बता सके। जस्टिस वर्मा इस वर्ष अप्रैल में हाईकोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे चुके हैं।

आरोप-1: घर में बड़ी मात्रा में बेहिसाब कैश मिला

जांच समिति ने पाया कि जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम में ₹500 के नोटों के बंडल और अधजले नोट मिले थे। फायर सर्विस और पुलिस कर्मचारियों ने जांच के दौरान बताया कि नोट सिर्फ एक जगह नहीं थे, बल्कि स्टोररूम के बड़े हिस्से में फैले हुए थे। दिल्ली फायर सर्विस के कर्मचारी अंकित सहगल ने बताया कि उन्होंने ₹500 के नोटों के बंडल देखे थे, जो स्टोररूम में 7-8 फीट तक फैले हुए थे।
पुलिस अधिकारी रूपचंद से जब पूछा गया कि क्या नकदी की मात्रा ₹5 लाख से ज्यादा थी, तो उन्होंने कहा कि यह आंकड़ा बहुत छोटा है। हालांकि नोटों को जब्त नहीं किया गया, उनकी गिनती नहीं हुई और न ही नमूने सुरक्षित किए गए, इसी वजह से समिति यह तय नहीं कर सकी कि वहां वास्तव में कितनी नकदी थी।
नतीजा: आरोप साबित।

आरोप-2: आग के बाद सबूतों से छेड़छाड़ हुई

आग बुझने के बाद स्टोररूम को तुरंत सील नहीं किया गया। सुरक्षा अधिकारी ने जस्टिस वर्मा के स्टाफ को वहां रात करीब 3 बजे सफाई करते देखा। सुबह तक जला हुआ सामान बाहर निकाल दिया गया और कमरा साफ कर दिया गया। वहां मिले नोट भी सुरक्षित नहीं किए गए और बाद में मिले भी नहीं। समिति ने माना कि महत्वपूर्ण सबूत सुरक्षित नहीं रखे गए और उनसे छेड़छाड़ हुई।
नतीजा: आरोप साबित।

आरोप-3: जस्टिस वर्मा के जवाब टालमटोल वाले और भ्रामक थे

शुरुआत में जस्टिस वर्मा ने कहा कि उन्हें कैश के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। बाद में बचाव में उन्होंने कहा कि नकदी नकली थी और उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया। लेकिन इन दावों के समर्थन में कोई FIR, शिकायत या ठोस सबूत सामने नहीं आया। जस्टिस वर्मा ने खुद गवाही नहीं दी और न ही अपने परिवार या स्टाफ को गवाह के तौर पर पेश किया। समिति ने उनकी सफाई को अधूरी, टालमटोल वाली और प्रभाव में भ्रामक माना।
नतीजा: आरोप साबित।

पूरा मामला कब क्या हुआ

  • 14 मार्च 2025: रात करीब 11:35 बजे जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगी। उस समय वे दिल्ली हाईकोर्ट में मौजूद थे। दिल्ली फायर सर्विस को स्टोररूम में जले नोटों के बंडलों से भरे बोरे मिले।
  • 21 मार्च 2025: दिल्ली हाईकोर्ट ने आंतरिक जांच शुरू की। जस्टिस वर्मा ने दावा किया कि यह साजिश के तहत उन्हें फंसाया गया मामला है।
  • 22 मार्च 2025: CJI संजीव खन्ना ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई और कैश की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की। इसी दिन SC कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया।
  • 3-4 मई 2025: जांच कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंपी, जिसमें आरोपों को सही पाया गया।
  • 8 मई 2025: CJI ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पत्र लिखकर महाभियोग प्रस्ताव की सिफारिश की, हालांकि यह उस वक्त सार्वजनिक नहीं की गई थी।
  • 19 मई 2025: जांच पैनल की 64 पन्नों की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें कहा गया कि जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का स्टोररूम पर सक्रिय नियंत्रण था।
  • 9 अप्रैल 2026: जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे दिया।
  • 12 अगस्त 2026: संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट लोकसभा और राज्यसभा में पेश हुई, जिसमें तीनों आरोप सही पाए गए।

निष्कर्ष:

संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड में एक साल से चल रहे विवाद पर मुहर लगा दी है। समिति ने न सिर्फ भारी नकदी मिलने की पुष्टि की है, बल्कि आग के बाद सबूतों से छेड़छाड़ और जस्टिस वर्मा के भ्रामक जवाबों को भी आरोप के तौर पर सही ठहराया है। हालांकि जस्टिस वर्मा पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं, इसलिए महाभियोग प्रक्रिया का आगे कोई व्यावहारिक असर नहीं रहेगा, लेकिन यह रिपोर्ट न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर एक अहम नजीर जरूर बन गई है।

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