बिहार में कचरा प्रबंधन के नए नियम लागू, 100 किलो कचरा पैदा करने वाले संस्थानों की बढ़ेगी जिम्मेदारी; उल्लंघन पर लगेगा जुर्माना

पटना: बिहार में कचरा प्रबंधन को लेकर नई व्यवस्था लागू हो गई है। अब कचरे को सिर्फ उठाकर फेंकने के बजाय उससे खाद, बिजली और गैस बनाने पर जोर दिया जा रहा है। नए नियमों के तहत प्रतिदिन 100 किलो या उससे अधिक कचरा पैदा करने वाले संस्थानों को बल्क वेस्ट जनरेटर माना जाएगा। ऐसे संस्थानों को कचरे के उचित निस्तारण की जिम्मेदारी निभानी होगी। नियमों का उल्लंघन करने पर पर्यावरणीय मुआवजा भी लगाया जा सकता है।

केंद्र सरकार ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 को 27 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया था। ये नियम 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी हो गए हैं। नए नियमों में कचरे के पृथक्करण, उसके वैज्ञानिक निस्तारण और प्रदूषण फैलाने वालों की जवाबदेही तय करने पर विशेष जोर दिया गया है। बिहार में भी इन नियमों को लागू करने की दिशा में काम किया जा रहा है।

100 किलो कचरा पैदा करने वाले संस्थानों को खुद उठानी होगी जिम्मेदारी

नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत प्रतिदिन 100 किलो या उससे अधिक ठोस कचरा पैदा करने वाले संस्थानों को बल्क वेस्ट जनरेटर की श्रेणी में रखा गया है। हालांकि, इसके लिए केवल कचरे की मात्रा ही नहीं, बल्कि भवन का क्षेत्रफल और पानी की खपत भी निर्धारित मानदंड हैं।

नियमों के अनुसार, 20 हजार वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले भवन, प्रतिदिन 40 हजार लीटर या उससे अधिक पानी की खपत करने वाले संस्थान अथवा प्रतिदिन 100 किलो या उससे अधिक कचरा पैदा करने वाली इकाइयां इस श्रेणी में आ सकती हैं। इसमें अस्पताल, होटल, शैक्षणिक संस्थान, आवासीय सोसाइटी और व्यावसायिक प्रतिष्ठान शामिल हैं।

ऐसे संस्थानों को अपने कचरे के प्रबंधन और निस्तारण की जिम्मेदारी निभानी होगी। नए बल्क वेस्ट जनरेटर को गीले कचरे के प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त व्यवस्था स्थापित करनी होगी। वहीं, पहले से संचालित कुछ संस्थानों को स्थानीय निकाय से छूट लेकर निर्धारित प्रक्रिया के तहत कचरा प्रबंधन प्रमाणपत्र प्राप्त करने का विकल्प दिया गया है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर संस्थान को अनिवार्य रूप से अपना अलग प्लांट लगाना होगा। नियमों के तहत निर्धारित शर्तों के अनुसार स्थानीय निकाय या अधिकृत प्रसंस्करण इकाइयों के माध्यम से भी कचरे का निस्तारण कराया जा सकता है।

नियमों का उल्लंघन करने पर लगेगा पर्यावरणीय मुआवजा

नए नियमों में प्रदूषण फैलाने वालों से उसकी भरपाई कराने के लिए ‘पॉल्यूटर पे’ सिद्धांत को शामिल किया गया है। इसके तहत कचरा प्रबंधन से संबंधित निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन नहीं करने वाली इकाइयों पर पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जा सकता है।

केंद्रीय नियमों में गैर-अनुपालन के मामलों में पर्यावरणीय मुआवजे का प्रावधान है। इसकी वसूली संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या प्रदूषण नियंत्रण समिति द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार की जाएगी। इसके अलावा, स्थानीय निकाय अपने उपनियमों में कचरा फेंकने, जलाने और अन्य उल्लंघनों के लिए जुर्माने का प्रावधान भी कर सकते हैं। हालांकि, हर मामले में जुर्माने की राशि एक समान नहीं होगी।

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कचरे को चार श्रेणियों में बांटना अनिवार्य

नए नियमों के तहत घरों, संस्थानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले कचरे को चार श्रेणियों में अलग-अलग करना होगा। इनमें गीला कचरा, सूखा कचरा, सैनिटरी कचरा और विशेष देखभाल वाला कचरा शामिल है।

गीले कचरे में भोजन के बचे हुए हिस्से और जैविक कचरे को रखा जाएगा। सूखे कचरे में पुनर्चक्रण योग्य और अन्य गैर-जैविक कचरा शामिल होगा। सैनिटरी कचरे में इस्तेमाल किए गए डायपर और सैनिटरी पैड जैसी चीजें आएंगी। वहीं, विशेष देखभाल वाले कचरे को अलग रखना होगा, ताकि उसका सुरक्षित निस्तारण किया जा सके।

नियमों के अनुसार, जैव-चिकित्सा कचरा, ई-कचरा, बैटरी कचरा और खतरनाक कचरे का प्रबंधन उनके लिए बनाए गए अलग-अलग नियमों के तहत होगा।

पटना के 13 नगर निकायों के कचरे से बनेगी 15 मेगावाट बिजली

बिहार में कचरे से बिजली बनाने की एक बड़ी परियोजना पर भी काम चल रहा है। पटना और आसपास के 12 अन्य शहरी निकायों के कचरे के निस्तारण के लिए रामचक बैरिया में एकीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना विकसित की जा रही है।

इस परियोजना के तहत प्रतिदिन 15 मेगावाट बिजली बनाने की योजना है। इसके लिए पटना सहित कुल 13 नगर निकायों का कचरा एक जगह लाकर वैज्ञानिक तरीके से संसाधित किया जाएगा। परियोजना में कचरे से खाद और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने की भी व्यवस्था होगी।

6 अगस्त 2026 को इस परियोजना के लिए करीब 514.59 करोड़ रुपये की लागत वाले प्रोजेक्ट का त्रिपक्षीय समझौता किया गया। इसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत विकसित किया जाना है। हालांकि, बिजली उत्पादन शुरू होने के लिए परियोजना का निर्माण और संचालन शुरू होना जरूरी है।

चार शहरों में लगेंगे CBG प्लांट

बिहार के भागलपुर, गया, मुजफ्फरपुर और बिहारशरीफ में कचरे से कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बनाने के लिए प्लांट लगाने की योजना भी बताई गई है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिकारियों ने बताया कि इन परियोजनाओं में निजी कंपनियां प्लांट स्थापित करेंगी और उत्पादित गैस की बिक्री भी करेंगी। सरकार की ओर से संबंधित परियोजनाओं के लिए जमीन, सड़क और बिजली जैसी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही गई है।

इन प्लांटों में मुख्य रूप से गीले कचरे का इस्तेमाल कर गैस तैयार की जाएगी। इससे कचरे के निस्तारण के साथ-साथ ऊर्जा उत्पादन का भी रास्ता खुलेगा।

बिहार के 264 शहरी निकायों में लागू होंगे नए उपनियम

बिहार के शहरी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन को व्यवस्थित करने के लिए 264 शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को नए उपनियम भेजे जाने की जानकारी अधिकारियों ने दी है।

इन उपनियमों में घर-घर कचरा संग्रहण, चार श्रेणियों में कचरे का पृथक्करण, उपयोगकर्ता शुल्क और बल्क वेस्ट जनरेटर का पंजीकरण जैसे प्रावधान शामिल हैं।

इसके अलावा, सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने और जलाने पर दंड का प्रावधान भी किया गया है। सड़क विक्रेताओं, बाजारों, आयोजनों और निर्माण एवं विध्वंस से निकलने वाले कचरे के प्रबंधन के लिए भी अलग व्यवस्था प्रस्तावित है।

अधिकारियों के अनुसार, इन उपनियमों को फरवरी 2027 तक सभी शहरी निकायों में लागू कराने का लक्ष्य रखा गया है। यह अधिकारियों द्वारा बताई गई समय-सीमा है, न कि सभी निकायों में लागू होने की पुष्टि।

ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे से खाद बनाने की व्यवस्था

बिहार के ग्रामीण इलाकों में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन का काम किया जा रहा है। इसके तहत गांवों में घर-घर कचरा संग्रहण, कचरे का पृथक्करण और उसके निस्तारण के लिए आधारभूत संरचना तैयार की गई है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिकारियों ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 7,500 कचरा प्रसंस्करण इकाइयों के माध्यम से कचरे को अलग-अलग किया जा रहा है। जैविक कचरे से खाद तैयार की जाती है, जबकि प्लास्टिक कचरे को प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण के लिए भेजा जाता है।

अधिकारियों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 175 प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाइयां हैं। इन इकाइयों के जरिए प्लास्टिक कचरे को उपयोगी उत्पादों में बदलने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि, इन इकाइयों की वर्तमान संख्या और संचालन की स्थिति की स्वतंत्र रूप से पूरी पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन आंकड़ों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए सरकारी अधिकारियों के बयान के रूप में देखा जाना चाहिए।

कचरे से खाद और राजस्व अर्जित करने का दावा

प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिकारियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे से खाद बनाने और उसके विक्रय से होने वाली आय का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, अब तक लगभग 1,600 मीट्रिक टन खाद का उत्पादन किया गया है, जिसमें से करीब 1,000 मीट्रिक टन खाद की बिक्री हुई है।

अधिकारियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोगकर्ता शुल्क के रूप में करीब 30 करोड़ रुपये एकत्र होने की बात भी कही। उनके अनुसार, प्लास्टिक कचरे की बिक्री से भी आय अर्जित की जा रही है।

इन प्रयासों का उद्देश्य कचरे को बेकार वस्तु के बजाय संसाधन के रूप में इस्तेमाल करना है। इससे कचरे के निस्तारण के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर पैदा करने की संभावना भी जताई गई है।

स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण में बिहार की रैंकिंग में सुधार

अधिकारियों ने स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2025 में बिहार के प्रदर्शन का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, बिहार ने पूर्वी क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया और भागलपुर तथा सुपौल जैसे जिलों ने उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया।

स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2025 से संबंधित प्रकाशित रिपोर्ट में भी बिहार के पूर्वी क्षेत्र में प्रदर्शन का उल्लेख किया गया है। हालांकि, किसी राज्य की रैंकिंग से सभी गांवों में स्वच्छता की स्थिति का एक समान होना साबित नहीं होता।

कचरा प्रबंधन में लोगों की भागीदारी जरूरी

अधिकारियों ने कहा कि केवल कचरा संग्रहण की व्यवस्था बना देने से स्वच्छता का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए लोगों के व्यवहार में बदलाव और उनकी सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।

लोगों से अपील की गई है कि वे अपने घरों से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर सफाई कर्मियों को दें। साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने और जलाने से बचें।

बिहार में नए नियमों और प्रस्तावित परियोजनाओं के जरिए कचरे को संसाधन में बदलने की दिशा में काम किया जा रहा है। इन योजनाओं का वास्तविक प्रभाव इनके समय पर क्रियान्वयन और नागरिकों की भागीदारी पर निर्भर करेगा।

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