वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने से नहीं होगी शादी वैध, पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

सिर्फ वोटर लिस्ट में पति-पत्नी के तौर पर नाम दर्ज हो जाने से शादी को कानूनी मान्यता नहीं मिल जाती। यह फैसला पटना हाईकोर्ट ने एक महिला की उस याचिका को खारिज करते हुए सुनाया, जिसमें उसने खुद को “पत्नी का दर्जा” दिए जाने की मांग की थी। कोर्ट ने साफ कहा कि हिंदू विवाह की वैधता के लिए सिंदूरदान और सात फेरे जैसी रस्में होना अनिवार्य है।

क्या है पूरा मामला

मुजफ्फरपुर निवासी सुरेश चौधरी से दुर्गावती की शादी 22 मई 1990 को हुई थी। दोनों के दो बच्चे भी हुए, लेकिन 28 नवंबर 1997 को सुरेश की मृत्यु हो गई। दुर्गावती का दावा है कि पति की मौत के बाद 2002 में दोनों परिवारों की सहमति से उसने अपने देवर सचिता चौधरी से हिंदू रीति-रिवाज से शादी कर ली। कुछ महीनों बाद दहेज को लेकर प्रताड़ना शुरू हुई और उसे घर से निकाल दिया गया।
11 मई 2004 को दुर्गावती ने सीवान फैमिली कोर्ट में केस दायर किया, जहां उसे भरण-पोषण के तौर पर एक हजार रुपये महीना देने का आदेश मिला। सचिता ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 18 जनवरी 2007 को याचिका खारिज हो गई। इसके बाद सचिता ने फैमिली कोर्ट में टाइटल सूट दाखिल कर दावा किया कि दोनों के बीच वैध विवाह हुआ ही नहीं था। 2020 में फैमिली कोर्ट ने यह याचिका स्वीकार करते हुए माना कि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न नहीं हुआ था। इसी फैसले के खिलाफ दुर्गावती ने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसे भी अब खारिज कर दिया गया है।

हाईकोर्ट ने खारिज करने के पीछे कौन-सी दलीलें दीं

दुर्गावती के वकील बिजय शंकर चौबे ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने सबूतों और गवाहों के बयानों का सही मूल्यांकन नहीं किया, और सालों बाद एक वैध विवाह को शून्य घोषित करना न्याय के खिलाफ है। उन्होंने 2004 के वोटर आईडी कार्ड का हवाला दिया, जिसमें सचिता को पति बताया गया था, साथ ही भरण-पोषण के आदेश को भी सबूत के तौर पर पेश किया।
लेकिन पटना हाईकोर्ट ने ये दलीलें खारिज करते हुए छह अहम बिंदु रखे:

  1. महिला अपने बयान में शादी की तारीख, स्थान या निभाई गई रस्मों का खुलासा नहीं कर सकीं।
  2. किसी भी गवाह ने सप्तपदी (सात फेरे) या सिंदूरदान जैसी धार्मिक रस्मों का जिक्र नहीं किया।
  3. कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का हवाला देते हुए कहा कि सिंदूरदान और सात फेरे अनिवार्य रस्में हैं।
  4. पुजारी की पहचान को लेकर गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाया गया। एक गवाह ने नाम बिंदेश्वरी तिवारी बताया तो दूसरे ने दिनेश्वर तिवारी।
  5. CrPC की धारा 125 के तहत मिलने वाला भरण-पोषण सिर्फ आर्थिक राहत है, यह विवाह की वैधता तय नहीं करता।
  6. वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होना विवाह की वैधता स्थापित नहीं करता।

सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट भी बना आधार

पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अप्रैल 2024 के सुप्रीम कोर्ट के एक अहम जजमेंट का भी हवाला दिया। दो कॉमर्शियल पायलट्स के तलाक मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा था कि हिंदू विवाह एक धार्मिक संस्कार है, न कि नाचने-गाने और खाने-पीने का इवेंट। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि दहेज व तोहफों के दबाव में बिना रस्मों के केवल कागजी तौर पर की गई शादी को मान्यता नहीं दी जा सकती। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल कर दोनों पायलट्स के मैरिज सर्टिफिकेट को ही रद्द कर दिया था।

रजिस्टर्ड मैरिज को लेकर भी बड़ा स्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 केवल हिंदुओं ही नहीं बल्कि लिंगायत, ब्रह्मो, आर्यसमाज, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों पर भी लागू होता है, और जब तक जरूरी रस्में नहीं निभाई जातीं, धारा 7 के तहत विवाह मान्य नहीं होगा। चाहे किसी अथॉरिटी से सर्टिफिकेट ही क्यों न मिल गया हो। गुजरात हाईकोर्ट ने जून 2026 में एक अलग मामले में भी यही सिद्धांत दोहराया कि मैरिज सर्टिफिकेट केवल पहले से हुई शादी का रिकॉर्ड है, वह खुद विवाह को मान्यता नहीं देता।

निष्कर्ष

पटना हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंदू विवाह की वैधता कागजी दस्तावेजों – जैसे वोटर लिस्ट में नाम या मैरिज सर्टिफिकेट  से नहीं, बल्कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत निभाई गई अनिवार्य रस्मों, खासकर सिंदूरदान और सप्तपदी (सात फेरे), से तय होती है। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 2024 के जजमेंट की ही कड़ी में आता है और उन तमाम मामलों के लिए एक अहम नजीर बनेगा जहां लोग सिर्फ सरकारी दस्तावेजों के आधार पर वैवाहिक अधिकार का दावा करते हैं।

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