ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को बहाल करने की मांग लंबे समय से उठ रही है, लेकिन केंद्र सरकार ने संसद में इस पर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। लोकसभा में केंद्र सरकार ने बताया कि OPS को वापस लागू करने का फिलहाल कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। सरकार ने इसके पीछे मुख्य वजह सरकारी खजाने पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ बताई है।
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश की राज्य सरकारों ने नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) से पुरानी पेंशन योजना में वापस जाने की जानकारी केंद्र सरकार और पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) को दी थी।
राज्यों का अधिकार, लेकिन कैग की चेतावनी
एक अन्य सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री ने साफ किया कि राज्यों में OPS की बहाली पूरी तरह राज्य सरकार के नीतिगत विवेकाधिकार का मामला है। यानी केंद्र इसमें दखल नहीं देगा। हालांकि, कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) ने अपनी हालिया ‘स्टेट फाइनेंस ऑडिट रिपोर्ट्स’ में राज्यों द्वारा OPS की ओर वापस लौटने से होने वाले वित्तीय नुकसान को साफ तौर पर रेखांकित किया है।
2004 से NPS, अब UPS का विकल्प भी मौजूद
NPS की शुरुआत एक डिफाइंड कंट्रीब्यूशन-बेस्ड योजना के तौर पर हुई थी, जो एक जनवरी 2004 या उसके बाद सेवा में शामिल होने वाले केंद्रीय कर्मचारियों के लिए लागू की गई।
NPS के तहत मिलने वाले पेंशन लाभ में सुधार के लिए तत्कालीन वित्त सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। इसी कमेटी के सुझावों और स्टेकहोल्डर्स के साथ बातचीत के आधार पर एक अप्रैल 2025 से यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) लागू की जा चुकी है।
UPS दरअसल NPS के तहत ही एक विकल्प है, जिसका मकसद रिटायरमेंट के बाद कम से कम ₹10,000 प्रति माह की न्यूनतम एश्योर्ड पे-आउट और महंगाई से जुड़ा तय पेंशन लाभ देना है। यह एक फंड-बेस्ड पे-आउट सिस्टम है, जो कर्मचारी और सरकार दोनों के नियमित योगदान और निवेश पर निर्भर करता है।
सात जुलाई तक केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए NPS के तहत कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹3.65 लाख करोड़ दर्ज किया गया है।
AUM और राजकोषीय घाटा — आसान भाषा में समझें
एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) का मतलब उस रकम से है, जिसे कोई वित्तीय संस्थान — जैसे PFRDA — निवेशकों या कर्मचारियों की तरफ से मैनेज करता है।
राजकोषीय घाटा सरकार की कुल कमाई और कुल खर्च के बीच का अंतर होता है। जब सरकार का खर्च उसकी आमदनी से ज्यादा हो जाता है, तो इस घाटे को पूरा करने के लिए उसे बाजार से उधार लेना पड़ता है। OPS जैसी योजनाओं का सीधा असर इसी राजकोषीय घाटे पर पड़ता है, क्योंकि इसमें पूरी पेंशन सरकारी खजाने से सीधे भुगतान होती है।
तीनों पेंशन योजनाओं में मुख्य अंतर
ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS):
- कर्मचारी का कंट्रीब्यूशन: शून्य प्रतिशत (सैलरी से कुछ नहीं कटता)
- सरकार का अंशदान: कोई तय हिस्सा नहीं, पूरी पेंशन सरकार देती है
- गारंटी: सौ प्रतिशत, आखिरी सैलरी का पचास प्रतिशत हिस्सा पेंशन के तौर पर तय
- महंगाई भत्ता: लागू, साल में दो बार DA और पेंशन बढ़ती है
- फंड मैनेजमेंट: सीधे सरकारी खजाने से भुगतान
नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS):
- कर्मचारी का कंट्रीब्यूशन: दस प्रतिशत (मूल वेतन + DA का हिस्सा)
- सरकार का अंशदान: चौदह प्रतिशत (केंद्र/राज्य सरकार मिलाती है)
- गारंटी: कोई गारंटी नहीं, रिटर्न पूरी तरह शेयर बाजार पर निर्भर
- महंगाई भत्ता: लागू नहीं
- फंड मैनेजमेंट: रजिस्टर्ड फंड मैनेजर संभालते है।
यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS):
- कर्मचारी का कंट्रीब्यूशन: दस प्रतिशत (मूल वेतन + DA)
- सरकार का अंशदान: साढ़े अठारह प्रतिशत
- गारंटी: सौ प्रतिशत, पच्चीस साल की नौकरी पर पिछले बारह महीने के औसत मूल वेतन का पचास प्रतिशत तय, न्यूनतम दस साल नौकरी पूरी होने पर ₹10,000 प्रति माह
- महंगाई भत्ता: लागू, अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर
- फंड मैनेजमेंट: सरकार द्वारा बनाए गए विशेष पेंशन फंड के जरिए
निष्कर्ष: केंद्र सरकार के इस जवाब से यह साफ हो गया है कि OPS की वापसी फिलहाल केंद्रीय स्तर पर संभव नहीं दिखती, भले ही कुछ राज्य अपने स्तर पर इसे लागू कर चुके हों। कैग की रिपोर्टें इशारा करती हैं कि OPS की ओर लौटना राज्यों के लिए आगे चलकर वित्तीय दबाव बढ़ा सकता है, जबकि UPS को सरकार एक संतुलित विकल्प के तौर पर पेश कर रही है जो गारंटीड पेंशन और फंड-बेस्ड सिस्टम, दोनों को साथ लेकर चलता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या और राज्य UPS को अपनाते हैं या OPS की मांग राजनीतिक रूप से और तेज होती है।
