बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को राज्यपाल की ओर से बिहार विधान परिषद के लिए मनोनीत कर दिया गया है। इसके साथ ही कई महीनों से उनके मंत्री पद पर मंडरा रहा संवैधानिक संकट फिलहाल टल गया है। उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को लेकर यह मामला हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा था, जिसका पटाक्षेप आज गजट अधिसूचना के साथ हो गया।
पहले जानिए, सीट कैसे खाली हुई
भाजपा MLC देवेश कुमार ने बीते सप्ताह अचानक विधान परिषद पहुंचकर सभापति के समक्ष अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। देवेश कुमार का कार्यकाल मार्च 2027 तक शेष था, बावजूद इसके उन्होंने पद छोड़ा। राजनीतिक हलकों में इसे भाजपा की सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा गया, ताकि खाली हुई सीट पर दीपक प्रकाश को मनोनीत कराकर उनका मंत्री पद बचाया जा सके, और सम्राट कैबिनेट की किरकिरी होने से बचा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला
दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता की ओर से दाखिल की गई थी। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) का हवाला दिया गया, जिसके अनुसार कोई भी व्यक्ति बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बिहार सरकार से तीखे सवाल पूछे और जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया था। इसी दबाव के बीच देवेश कुमार का इस्तीफा और उसके बाद दीपक प्रकाश का मनोनयन एक-दूसरे से जुड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है।
पहली बार मंत्री कब बने — नीतीश कैबिनेट में
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। उस समय भी वे न विधायक थे, न ही MLC। उन्हें पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी दी गई थी। 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के साथ ही उनका यह कार्यकाल समाप्त हो गया — करीब चार महीने 26 दिन तक वे मंत्री रहे।
दूसरी बार मंत्री — सम्राट चौधरी कैबिनेट में
करीब 22 दिन तक मंत्री पद से बाहर रहने के बाद, 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार में दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इस बार भी उन्हें पंचायती राज विभाग ही सौंपा गया — यानी दोनों बार अलग-अलग सरकारों में विभाग एक ही रहा। हालांकि इस दूसरे कार्यकाल में भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं बन पाए थे, जिसके चलते संवैधानिक सवाल और तेज हो गया।
उपेंद्र कुशवाहा का ट्वीट
इस पूरे घटनाक्रम पर उपेंद्र कुशवाहा ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने राष्ट्रीय लोक मोर्चा के युवा नेता एवं पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद सदस्य मनोनीत किए जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को टैग करते हुए आभार जताया। साथ ही उन्होंने संबंधित गजट अधिसूचना की प्रति भी साझा की, जिसमें दीपक प्रकाश के नाम की पुष्टि होती है।
परिवारवाद के आरोपों के बीच
इस पूरे प्रकरण में उपेंद्र कुशवाहा पर परिवारवाद के आरोप भी लगते रहे हैं — उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को विधायक बनाया गया, बेटे दीपक प्रकाश को अब विधान परिषद पहुंचाया गया है, और खुद कुशवाहा राज्यसभा सदस्य हैं। इन आरोपों पर कुशवाहा पहले भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि पार्टी (राष्ट्रीय लोक मोर्चा) को बचाए रखने के लिए उन्हें यह राजनीतिक कदम उठाने पड़े।
निष्कर्ष
देवेश कुमार के इस्तीफे से लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और अब राज्यपाल के मनोनयन तक — यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि भाजपा और सहयोगी दलों ने सुनियोजित तरीके से दीपक प्रकाश का मंत्री पद बचाने की रणनीति पर काम किया। संवैधानिक चुनौती फिलहाल टल गई है, लेकिन उनका मौजूदा MLC कार्यकाल केवल मार्च 2027 तक ही सीमित रहेगा, क्योंकि वे देवेश कुमार का शेष कार्यकाल ही पूरा करेंगे। ऐसे में आने वाले महीनों में उन्हें मंत्री पद बनाए रखने के लिए फिर से सदन की सदस्यता का रास्ता तलाशना होगा — यानी यह अध्याय भले बंद हो गया हो, लेकिन बिहार की राजनीति में उपेंद्र कुशवाहा परिवार से जुड़ा यह सिलसिला अभी पूरी तरह थमा नहीं है।
