बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। वजह है एक आर्थिक शोध संस्था की रिपोर्ट, जिसने सीधे तौर पर सिफारिश की है कि राज्य को दस साल पुराना यह कानून वापस ले लेना चाहिए। जहां सत्ताधारी गठबंधन में शामिल JDU ने रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है, वहीं BJP ने इस मुद्दे पर सधी हुई चुप्पी बना रखी है। सवाल यह है कि आखिर BJP का असली रुख क्या है और क्या राजनीतिक विवाद के बिना भी यह कानून खत्म हो सकता है।
NCAER की सिफारिश और उस पर मचा सियासी बवाल
राष्ट्रीय व्यय अर्थशास्त्र अनुसंधान परिषद यानी NCAER के एक शोध पत्र में सिफारिश की गई है कि बिहार को शराबबंदी कानून खत्म कर देना चाहिए। यह पेपर अर्थशास्त्री रत्ना साहे के नेतृत्व में आकाश देव, संतोष गौतम और निशिथ प्रकाश की टीम ने तैयार किया और NCAER के India Policy Forum में प्रस्तुत किया। बिहार में लागू शराबबंदी की समीक्षा को लेकर यह रिपोर्ट पिछले हफ्ते सार्वजनिक हुई और तभी से राज्य की राजनीति में हलचल मची हुई है।
रिपोर्ट सामने आते ही JDU के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने तीखी प्रतिक्रिया दी और दावा किया कि इस नीति ने ग्रामीण बिहार की महिलाओं की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया है। JDU सांसद देवेश चंद्र ठाकुर का सुर थोड़ा अलग रहा, उन्होंने शराबबंदी जारी रहने पर संतोष जताया, लेकिन साथ ही यह भी माना कि शराब की खपत पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है और नीति की समीक्षा होनी चाहिए। दूसरी ओर, डिप्टी CM बिजेंद्र प्रसाद यादव और मंत्री सुनील कुमार ने साफ कहा कि बिहार में शराबबंदी लागू रहेगी।
BJP की चुप्पी के पीछे सीधा गणित है
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पार्टी मानती है कि शराब बिक्री दोबारा शुरू होने से सरकारी खजाने में बड़ा राजस्व आ सकता है, लेकिन नीति में तुरंत ढील देने से पूर्व मुख्यमंत्री और अब राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार असहज हो सकते हैं। इसलिए भाजपा का रुख है कि व्यापक सहमति और कैबिनेट के सामूहिक फैसले के बिना जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया जाएगा।
महिला वोट बैंक का समीकरण भी इस झिझक की एक बड़ी वजह है। 2025 विधानसभा चुनाव में 243 में से 130 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोट डाले, और इनमें से 114 यानी 88% सीटों पर NDA गठबंधन ने जीत दर्ज की। 2020 के चुनाव में भी 167 ऐसी सीटों में से 92 NDA के खाते में गई थीं। शराबबंदी को महिला वोटरों से सीधे जोड़कर देखा जाता रहा है, इसलिए इसे अचानक खत्म करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का रास्ता: बिना विवाद के कानून खत्म करने का विकल्प
राजनीतिक रूप से देखा जाए तो निकट भविष्य में शराबबंदी हटने की संभावना कम है। लेकिन सरकार के पास एक ऐसा रास्ता मौजूद है, जिससे बिना सीधी राजनीतिक जिम्मेदारी लिए इस कानून को खत्म किया जा सकता है — और वह है सुप्रीम कोर्ट का फैसला।
30 सितंबर 2016 को पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश इक़बाल अहमद अंसारी और न्यायमूर्ति नवनीति प्रसाद सिंह की खंडपीठ ने बिहार सरकार की शराबबंदी अधिसूचना को असंवैधानिक और “अत्यंत अनुचित” बताते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने इसे संविधान के विपरीत करार दिया था। इसके दो दिन बाद ही राज्य सरकार एक नए और सख्त कानून, बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 — के साथ फिर से मैदान में आ गई थी।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां पहली ही सुनवाई में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी गई थी। तब से यह मामला वर्षों से लंबित है और बार-बार सुनवाई की तारीखें टलती रही हैं। बीते करीब दो साल से इस पर कोई सुनवाई तक नहीं हो पाई है। अगर सुप्रीम कोर्ट कभी इस मामले पर अंतिम फैसला सुनाकर शराबबंदी कानून को गलत ठहराता है, तो राज्य सरकार बिना सीधी राजनीतिक जिम्मेदारी लिए जनता और सहयोगी दल JDU के सामने अदालती आदेश का हवाला देकर नीति बदल सकती है।
पटना हाईकोर्ट ने अपने मूल फैसले में मुख्य रूप से चार आधार गिनाए थे — पुराने आबकारी कानून के मकसद से पूरी तरह उलट नई नीति; सरकार की अपनी 2015 की उत्पाद नीति से मात्र पांच दिन में पलटना; अनुच्छेद-21 के तहत निजता के अधिकार का हनन; और शराब कारोबारियों से भारी लाइसेंस फीस लेने के बाद अचानक प्रतिबंध लगाकर अनुच्छेद-14 का उल्लंघन। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि संविधान का अनुच्छेद-47 सरकार को शराबबंदी की कोशिश करने का अधिकार जरूर देता है, बशर्ते वह संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करे।
NCAER रिपोर्ट के दावे: महिला सुरक्षा और राजस्व पर सवाल
NCAER की रिपोर्ट का शीर्षक है — “बिहार के विकास का व्यापक परिदृश्य: उपलब्धियां, अधूरा एजेंडा और आगे का रास्ता।” रिपोर्ट के मुताबिक बिहार देश की आबादी का 9 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा है और 2026 में इसकी जनसंख्या 13.2 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, जो इसे दुनिया के ज्यादातर देशों से बड़ा बनाता है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार के पास राजस्व जुटाने के सीमित रास्ते बचे हैं, क्योंकि कर-पंजीकरण शुल्क और भू-राजस्व में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी की गुंजाइश नहीं है। खासकर इसलिए कि करीब 95 प्रतिशत परिवारों के पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है।
रिपोर्ट का सबसे विवादित दावा यह है कि शराबबंदी अपने मूल मकसद – घरेलू हिंसा और महिलाओं के खिलाफ अपराध घटाने में सफल नहीं रही। NCRB के आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट कहती है कि 2016 में बंदी लागू होने के बाद से महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में कमी नहीं आई, बल्कि इनमें बढ़ोतरी ही दर्ज हुई है। साथ ही रिपोर्ट में अवैध शराब कारोबार, तस्करी और नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में इजाफे की भी बात कही गई है।
राजस्व के मोर्चे पर रिपोर्ट का अनुमान है कि बंदी से पहले शराब पर एक्साइज ड्यूटी राज्य के कुल राजस्व का करीब 14 प्रतिशत हिस्सा हुआ करती थी। रिपोर्ट का दावा है कि अगर यह ड्यूटी दोबारा लागू की जाए, तो राज्य का अपना राजस्व 14 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, और साथ ही निगरानी व तस्करी-रोधी अभियानों पर हो रहा भारी सरकारी खर्च भी घट सकता है। रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान अर्थशास्त्री कार्तिक मुरलीधरन ने यह भी कहा कि सिर्फ शराबबंदी हटा देना काफी नहीं होगा, क्योंकि यह राजनीतिक रूप से एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
बिहार सरकार के मंत्री दिलीप जायसवाल ने रिपोर्ट पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सिर्फ पैसा कमाने के नाम पर सिद्धांतों और मानवता से समझौता नहीं किया जा सकता। मंत्री मदन साहनी ने भी प्रवर्तन को लेकर सख्त रुख अपनाए रखा है। इससे साफ है कि सरकार के भीतर भी इस रिपोर्ट को लेकर एकराय नहीं है।

निष्कर्ष
NCAER की रिपोर्ट ने बिहार की शराबबंदी नीति पर बहस को नए सिरे से खड़ा कर दिया है, लेकिन फिलहाल राज्य सरकार के जल्दबाजी में कोई फैसला लेने के आसार कम हैं। JDU के भीतर भी राय बंटी हुई है। कुछ नेता कानून का पुरजोर बचाव कर रहे हैं तो कुछ समीक्षा की जरूरत मान रहे हैं। BJP की खामोशी दरअसल एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है, जिसमें राजस्व का लालच और महिला वोट बैंक खोने का डर, दोनों साथ-साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला ही वह रास्ता बन सकता है, जिससे सरकार बिना सीधी राजनीतिक जिम्मेदारी लिए नीति बदल सके। जब तक अदालत या गठबंधन की राजनीति में कोई निर्णायक मोड़ नहीं आता, बिहार में शराबबंदी कानून का जारी रहना ही तय दिखता है।

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