दीपक प्रकाश का मंत्री पद बचा : भाजपा MLC देवेश कुमार का इस्तीफा, जानें पूरी सियासी कहानी

बिहार की सियासत में एक बड़ा उलटफेर हुआ है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश अब बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री बने रहेंगे। उनके मंत्री पद पर मंडरा रहा संकट भाजपा के MLC रहे देवेश कुमार के इस्तीफे के साथ फिलहाल टल गया है। यह पूरा घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक सुनवाई से जुड़ा है, जिसमें दीपक प्रकाश के बिना चुनाव जीते मंत्री बने रहने को चुनौती दी गई थी।

उपेंद्र कुशवाहा की प्रेशर पॉलिटिक्स रंग लाई

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLM के चार विधायक चुने गए, जिनमें एक उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा भी शामिल हैं। इसके बावजूद तीन अन्य विधायकों के टूटने की चर्चाएं कई बार उठीं और भाजपा की ओर से कथित तौर पर पार्टी के विलय का दबाव भी बनाया गया, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा इसके लिए तैयार नहीं हुए।
कुशवाहा को यह मालूम था कि किसी भी सदन का सदस्य न होने के चलते उनके बेटे दीपक प्रकाश का मंत्री पद जा सकता है, बावजूद इसके उन्होंने बेटे से इस्तीफा नहीं दिलाया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह भी दावा किया कि दीपक प्रकाश महज दो-चार महीने के लिए नहीं, बल्कि 2030 तक पूरे कार्यकाल के लिए मंत्री बने हैं और यह फैसला सिर्फ उनकी पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे NDA की सहमति से हुआ है।

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, कुशवाहा को अच्छी तरह पता है कि आगामी विधानसभा चुनावों में लव-कुश (कुर्मी-कोइरी/कुशवाहा) समीकरण भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है। इसी दबाव की राजनीति का नतीजा रहा कि भाजपा आलाकमान ने अपने ही एक MLC से इस्तीफा दिलवाकर दीपक प्रकाश के लिए विधान परिषद जाने और मंत्री पद बचाने का रास्ता साफ किया। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली से सीधा संदेश आने के बाद देवेश कुमार ने शुक्रवार को सभापति अवधेश नारायण सिंह को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस पूरे फैसले के पीछे बिहार भाजपा के बड़े नेताओं का दबाव भी बताया जा रहा है।

अब देवेश कुमार का क्या होगा?

इस्तीफे की वजह और आगे की जिम्मेदारी को लेकर पूछे गए सवालों पर देवेश कुमार ने मीडिया से कहा कि वे पार्टी के सच्चे सिपाही हैं और नेतृत्व का हर फैसला उन्हें मंजूर है। पार्टी सूत्रों के अनुसार आगे उन्हें संगठन में अहम जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

क्या देवेश कुमार का कद घटा है?

फिलहाल देवेश कुमार ने सिर्फ MLC पद से इस्तीफा दिया है। उनका कद घटा है या नहीं, यह अगली जिम्मेदारी मिलने के बाद ही साफ हो सकेगा। गौरतलब है कि जब से बिहार भाजपा संगठन की कमान सम्राट चौधरी के हाथ में आई है, तब से देवेश कुमार का कद कमजोर हुआ माना जाता रहा है। इससे पहले संजय जायसवाल के प्रदेश अध्यक्ष रहने के दौरान वे प्रदेश महासचिव जैसे अहम पद पर थे।
देवेश कुमार को केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय के करीबी खेमे का माना जाता है। पत्रकारिता पृष्ठभूमि से आने वाले देवेश की राजनीति में एंट्री भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली ने कराई थी और उन्हें बिहार भेजा था। जनवरी 2024 में जब नीतीश कुमार दूसरी बार महागठबंधन छोड़कर NDA में आए, तब देवेश कुमार भूमिहार कोटे से मंत्री पद की दौड़ में शामिल थे। मार्च 2023 में सम्राट चौधरी के बिहार भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद नई टीम गठित हुई तो संगठन में देवेश कुमार की छुट्टी कर दी गई थी।
दिल्ली भाजपा में देवेश कुमार की मजबूत पकड़ मानी जाती है। वे समस्तीपुर के पूसा प्रखंड स्थित मोहम्मदपुर देवपाट गांव के एक जमींदार परिवार से आते हैं। उनके दादा यमुना कारजी स्वतंत्रता सेनानी, प्रमुख किसान नेता और पत्रकार रहे थे। पटना में उनके परिवार की काफी अचल संपत्ति बताई जाती है।

क्या दीपक प्रकाश पूरे 5 साल मंत्री बने रह पाएंगे?

देवेश कुमार से इस्तीफा दिलवाकर भाजपा ने दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर आए संकट को फिलहाल टाल तो दिया है, लेकिन वे पूरे पांच साल पद पर बने रहेंगे? यह अभी तय नहीं है। देवेश कुमार 17 मार्च 2021 को राज्यपाल मनोनीत कोटे से MLC बने थे और उनका कार्यकाल अगले साल मार्च तक ही था। अब उनकी जगह विधान परिषद जाने वाले दीपक प्रकाश का कार्यकाल भी मार्च 2027 तक ही रहेगा। यानी करीब आठ महीने बाद उन्हें दोबारा विधानसभा या विधान परिषद जाने की व्यवस्था देखनी होगी, वरना उनका मंत्री पद फिर संकट में पड़ सकता है।

भाजपा के लिए उपेंद्र कुशवाहा क्यों अहम हैं?

2023 में हुई जातीय गणना के अनुसार बिहार में कुशवाहा समाज की आबादी 4.2 फीसदी है। भाजपा की कोशिश इस समुदाय के वोटरों को अपने साथ बनाए रखने की है, और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी खुद कुशवाहा बिरादरी से आते हैं।
उपेंद्र कुशवाहा की छवि बिहार के एक बड़े कुशवाहा नेता की मानी जाती है। उनकी पार्टी की पकड़ करीब 50 विधानसभा सीटों पर बताई जाती है, जहां कुशवाहा वोटर निर्णायक भूमिका में हैं, वहीं लोकसभा की 9 सीटों पर भी यह जातीय समीकरण मजबूत असर रखता है। बिहार में 1 से 2 फीसदी वोट के इधर-उधर खिसकने से नतीजों में बड़ा फर्क आ जाता है, इसलिए भाजपा नेतृत्व उपेंद्र कुशवाहा को साथ बनाए रखने की कोशिश में जुटा है। यही वजह मानी जाती है कि करीब पांच महीने पहले भाजपा ने अपने विधायकों के समर्थन से उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा था।

दीपक प्रकाश के मंत्री पद को सुप्रीम कोर्ट में किसने चुनौती दी?

सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत दीपक प्रकाश को दोबारा पंचायती राज मंत्री बनाए जाने को अवैध बताया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि एक ही विधानसभा के कार्यकाल के भीतर सिर्फ सरकार या मुख्यमंत्री बदलने का हवाला देकर किसी गैर-विधायक को दोबारा छह महीने की छूट देकर मंत्री नहीं बनाया जा सकता।
याचिका के मुताबिक, पहली बार मंत्री बनने के बाद बिना चुनाव जीते मंत्री बने रहने की तय छह महीने की अवधि 20 मई 2026 को ही समाप्त हो चुकी थी, और सरकार बदलने, इस्तीफे या मंत्रिमंडल के पुनर्गठन के सहारे इस समय-सीमा को ‘रीसेट’ नहीं किया जा सकता।
गौरतलब है कि दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बनाया गया था, उस वक्त वे न तो विधानसभा और न ही विधान परिषद के सदस्य थे। उनकी छह महीने की अवधि पूरी होने से पहले ही 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार सरकार गिर गई और मंत्रिपरिषद भंग हो गई। इसके बाद 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनी, जिसमें दीपक प्रकाश को दोबारा बिना चुनाव जीते पंचायती राज मंत्री पद की शपथ दिला दी गई।

संविधान का अनुच्छेद 164(4) क्या कहता है?

संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन — विधानसभा या विधान परिषद — का सदस्य न होने वाले व्यक्ति को भी मंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन शर्त यह है कि नियुक्ति की तारीख से लगातार छह महीने के भीतर उसे चुनाव जीतकर या मनोनीत होकर किसी एक सदन की सदस्यता हासिल करनी होगी। ऐसा न होने पर छह महीना पूरा होते ही उसका मंत्री पद स्वतः समाप्त माना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले पर 30 जुलाई को सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बिहार सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि बिना चुनाव जीते छह महीने की अनिवार्य अवधि बीत जाने के बाद भी कोई मंत्री अपने पद पर कैसे बना रह सकता है। CJI सूर्यकांत ने इसे कानून से जुड़ा सवाल बताते हुए कहा कि राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि बिना निर्वाचित हुए कोई मंत्री छह महीने से अधिक समय तक पद पर कैसे बना रह सकता है। मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को होनी है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर देखा जाए तो दीपक प्रकाश का मंत्री पद फिलहाल एक अस्थायी राजनीतिक जुगाड़ से बचा है, स्थायी संवैधानिक समाधान से नहीं। भाजपा ने देवेश कुमार से इस्तीफा दिलाकर सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल को थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन असली पेच अभी भी बरकरार है — दीपक प्रकाश का विधान परिषद कार्यकाल भी मार्च 2027 तक ही सीमित है, यानी आठ महीने बाद यह संकट फिर सामने आ सकता है। साथ ही, अनुच्छेद 164(4) की छह महीने की समय-सीमा को सरकार बदलने के बहाने बार-बार ‘रीसेट’ किया जा सकता है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी बाकी है, जो 4 अगस्त की सुनवाई में और स्पष्ट हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम से यह भी साफ है कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा उपेंद्र कुशवाहा और लव-कुश (कुर्मी-कोइरी/कुशवाहा) समीकरण को नाराज करने के जोखिम में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहती, भले ही इसके लिए उसे अपने ही एक वरिष्ठ MLC की कुर्बानी क्यों न देनी पड़े। वहीं देवेश कुमार के लिए यह इस्तीफा फिलहाल एक ‘संगठनात्मक बलिदान’ जैसा दिख रहा है, जिसका राजनीतिक प्रतिफल उन्हें आगे संगठन में मिलने वाली जिम्मेदारी से ही तय होगा। यानी यह कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है — दीपक प्रकाश का मंत्री पद, देवेश कुमार का राजनीतिक भविष्य और अनुच्छेद 164(4) पर सुप्रीम कोर्ट का रुख, तीनों मोर्चों पर आने वाले हफ्तों में बड़े फैसले होने बाकी हैं।

Leave a Comment