पत्नी पर व्यभिचार का आरोप? पहले होगा फैसला, तब मिलेगा गुजारा भत्ता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े गुजारा भत्ता (Maintenance) के मामलों में एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार (Adultery) का आरोप लगाता है और शुरुआती स्तर पर उसके समर्थन में ठोस सबूत पेश कर देता है, तो अदालत को अंतिम फैसले तक इंतजार किए बिना इस आरोप पर पहले विचार करना होगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह आदेश शुक्रवार को राजस्थान हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर सुनाया।

व्यभिचार का मतलब क्या है?

व्यभिचार यानी किसी विवाहित व्यक्ति का अपने जीवनसाथी के अलावा किसी और के साथ शारीरिक संबंध बनाना। भारत में यह अब आपराधिक अपराध नहीं है — 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामले में IPC की धारा 497 को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया था। लेकिन तलाक और गुजारा भत्ता के मामलों में व्यभिचार आज भी एक मान्य कानूनी आधार है।

धारा 125 और धारा 125(4) — CrPC — में क्या फर्क है?

धारा 125, CrPC: यह प्रावधान पत्नी, बच्चों और असहाय माता-पिता को भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) पाने का अधिकार देता है, ताकि उन्हें बेसहारा होने से बचाया जा सके। इसका मकसद तेज और सस्ता न्याय देना है।

धारा 125(4), CrPC: यह धारा 125 का ही एक अपवाद है। इसके अनुसार अगर पत्नी व्यभिचार में रह रही है, या बिना उचित कारण पति के साथ रहने से इनकार करती है, या दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हैं — तो ऐसी पत्नी न तो अंतरिम और न ही अंतिम गुजारा भत्ता पाने की हकदार होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ धारा 125(4) के तहत आवेदन दाखिल कर देने भर से गुजारा भत्ता अपने आप नहीं रुक जाता। लेकिन अगर पति स्पष्ट और ठोस सबूत पेश कर दे जो प्रथम दृष्टया (prima facie) आरोप को साबित करता हो, तो अदालत को उस पर विचार करना ही होगा। अगर मामले में गहन साक्ष्य परीक्षण की जरूरत हो, तो अंतरिम गुजारा भत्ता तब तक जारी रहेगा जब तक आवेदन पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?

यह मामला राजस्थान के एक दंपति से जुड़ा है। पत्नी ने उदयपुर की एक अदालत में अंतिम गुजारा भत्ता के लिए आवेदन दिया था। इसके जवाब में पति ने धारा 125(4) के तहत आपत्ति दाखिल करते हुए दावा किया कि उसकी पत्नी व्यभिचारपूर्ण संबंधों में रह रही है, इसलिए वह गुजारा भत्ता की हकदार नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने पति की यह आपत्ति खारिज कर दी थी, और राजस्थान हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा था। इसी के खिलाफ पति सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पति ने पत्नी के कथित व्यभिचार को साबित करने के लिए कई तस्वीरें और वीडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश किए थे। ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि इन सबूतों की सत्यता की जांच पूर्ण सुनवाई के बाद ही हो सकती है, इसलिए अंतरिम चरण में इस पर विचार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस रवैये को गलत बताते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इन सबूतों की जांच कर आरोप पर मेरिट के आधार पर फैसला करे। साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी को भी इन सबूतों की प्रामाणिकता और वैधता को चुनौती देने का पूरा अधिकार है।

निजी जासूसों (प्राइवेट डिटेक्टिव) पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी चिंता

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक और अहम पहलू पर ध्यान दिलाया — मैट्रिमोनियल विवादों में निजी जासूसों की बढ़ती भूमिका। कोर्ट ने सवाल उठाया कि सबूत के तौर पर पेश की गई तस्वीरें और वीडियो किसने जुटाए, क्या वे ऐसा करने के लिए अधिकृत थे, यह जानकारी कैसे सुरक्षित रखी गई, और क्या आधुनिक तकनीक से इन सबूतों में हेरफेर की गुंजाइश है।

कोर्ट ने कहा कि भारत में फिलहाल निजी जासूसी एजेंसियों को नियंत्रित करने वाला कोई कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। इसलिए सबूत जुटाने, उन्हें सुरक्षित रखने, निजता (प्राइवेसी) की रक्षा, जासूसों की जवाबदेही और शिकायत निवारण जैसे मुद्दों पर स्पष्ट नियम बनाने की सख्त जरूरत है। कोर्ट ने प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसीज (रेगुलेशन) बिल, 2007 का जिक्र किया, जो कभी कानून नहीं बन पाया। साथ ही ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, नीदरलैंड्स और सिंगापुर जैसे देशों में मौजूद नियामक व्यवस्थाओं का अध्ययन करने का सुझाव भी दिया।

सरकार और विधि आयोग को निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की एक प्रति कानून एवं न्याय मंत्रालय के सचिव और भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष को भेजी जाए, ताकि वे निजी जासूसी एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए उपयुक्त कानूनी ढांचा बनाने की जरूरत पर विचार कर सकें।

अंत में क्या हुआ फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामला वापस ट्रायल कोर्ट को भेज दिया, ताकि वह पति की धारा 125(4) वाली आपत्ति पर कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों के आधार पर नए सिरे से फैसला करे।

निष्कर्ष

इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि अगर किसी मामले में पति व्यभिचार का आरोप लगाकर उसके समर्थन में शुरुआती ठोस सबूत पेश करता है, तो अदालत उस आरोप को नजरअंदाज कर सीधे अंतरिम गुजारा भत्ता का आदेश नहीं दे सकती — उसे पहले आरोप की जांच करनी होगी। साथ ही, इस फैसले ने मैट्रिमोनियल विवादों में निजी जासूसों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने की जरूरत पर भी राष्ट्रीय स्तर की बहस छेड़ दी है।

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